कोल्हापुर: आमतौर पर किसी व्यक्ति या परिवार की पहचान उसके नाम, उपनाम, घर या पेशे से होती है, लेकिन महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में एक ऐसा गांव है जहां पहचान का तरीका बिल्कुल अनोखा है। यहां लोगों को किसी परिवार के बारे में जानना हो तो उसकी गाड़ी की नंबर प्लेट देखना ही काफी है। प्रयाग चिखली गांव में कार और मोटरसाइकिल के रजिस्ट्रेशन नंबर के आखिरी चार अंक परिवार की पहचान बन चुके हैं। करीब 10 हजार की आबादी वाले इस गांव में यह परंपरा तीन दशक से भी ज्यादा समय से चली आ रही है।
किसी परिवार की पहचान 8282 तो किसी की 7777 नंबर से
गांव के सरपंच रोहित पाटिल के मुताबिक, यहां करीब 75 प्रतिशत निवासियों ने अपनी गाड़ियों के लिए खास नंबर रखने की परंपरा अपना ली है। पसंदीदा नंबर हासिल करने के लिए लोग 5 हजार से लेकर 50 हजार रुपये तक खर्च करने को तैयार रहते हैं। कई ग्रामीण तो नई गाड़ी खरीदने से पहले ही क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय यानी आरटीओ में अपनी पसंद का नंबर बुक करा लेते हैं।
गांव के निवासी शिवतेज शंकर यादव के परिवार के पास कुल आठ वाहन हैं। इनमें छह मोटरसाइकिल, एक स्कूटर और एक कार शामिल हैं। उनके पिता और भाई के वाहनों समेत सभी आठ गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन नंबर के आखिरी चार अंक 0554 हैं। परिवार ने यह नंबर इसलिए चुना है, क्योंकि उनके मुताबिक इन अंकों को खास तरीके से लिखने पर परिवार के सदस्यों के नाम के शुरुआती अक्षर ‘SSY’ जैसे दिखाई देते हैं।
इसी तरह संपतराव दलवी के संयुक्त परिवार में 25 सदस्य हैं और उनके पास कुल 11 वाहन हैं। कार से लेकर बिजली से चलने वाले स्कूटर तक सभी के नंबर के आखिरी चार अंक 8282 हैं। गांव के राजपूत परिवार की पहचान 5151 नंबर से होती है, जबकि पांडुरंग यादव के परिवार ने 7777 नंबर को अपनी पहचान बना रखा है।
गांव में सैलून चलाने वाले सजराव सालुंके ने भी अपने तीनों दोपहिया वाहनों के लिए 1314 नंबर चुना है। इसकी वजह यह है कि इन अंकों का योग नौ होता है और वह इसे शुभ मानते हैं। इस तरह गांव के हर परिवार के पसंदीदा नंबर के पीछे अपनी अलग वजह और मान्यता है।
1990 में किसान ने शुरू की थी अनोखी परंपरा
प्रयाग चिखली में वाहनों के लिए एक जैसे खास नंबर रखने का चलन साल 1990 में स्थानीय किसान और राजनीतिक कार्यकर्ता पांडुरंग यादव ने शुरू किया था। उन्होंने अपनी पहली गाड़ी के लिए 7777 नंबर लिया। इसके बाद जब उन्होंने दूसरी गाड़ियां खरीदीं तो उनमें भी इसी नंबर को बरकरार रखा।
धीरे-धीरे उनके पड़ोसियों और गांव के दूसरे परिवारों ने भी इस परंपरा को अपनाना शुरू कर दिया। आज करीब 1,900 परिवारों वाले इस गांव में अनुमानित तीन से चार हजार वाहन हैं।
सरपंच रोहित पाटिल के परिवार की तीन गाड़ियों के नंबर के आखिरी चार अंक 3500 हैं। उनके दादा ने करीब 30 साल पहले यह नंबर चुना था। बाद में उनके पिता ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाया और अब तीसरी पीढ़ी भी इसे निभा रही है। इस तरह वाहन का नंबर यहां सिर्फ पहचान नहीं, बल्कि पारिवारिक विरासत का हिस्सा बन गया है।
खास नंबर के लिए आरटीओ में लगती है बोली, लाखों रुपये तक खर्च
गांव के लोगों का खास नंबरों के प्रति लगाव केवल पसंद तक सीमित नहीं है। इसके लिए वे सरकारी शुल्क देने के साथ जरूरत पड़ने पर नीलामी में भी हिस्सा लेते हैं।
कोल्हापुर के उपक्षेत्रीय परिवहन अधिकारी मनोज गजानन ओटारी के मुताबिक, विशेष नंबरों की मांग इतनी अधिक है कि नई पंजीकरण श्रृंखला शुरू होते ही कई बार सैकड़ों आवेदन पहुंच जाते हैं। हाल ही में कारों की नई नंबर श्रृंखला शुरू होने के पहले ही दिन करीब 345 आवेदन मिले थे।
जब किसी एक नंबर के लिए कई लोग दावेदारी करते हैं तो सबसे ज्यादा बोली लगाने वाले व्यक्ति को वह नंबर आवंटित किया जाता है। कोल्हापुर का वाहन पंजीकरण कोड MH09 है। ऐसे में नौ अंक वाले या जिन अंकों का कुल योग नौ होता है, वे नंबर लोगों के बीच खास लोकप्रिय हैं। एक मामले में मोटरसाइकिल के लिए 1008 नंबर हासिल करने पर डेढ़ लाख रुपये तक खर्च किए गए थे।
गाड़ियों के बाद मोबाइल नंबर भी खास अंकों से जोड़ रहे ग्रामीण
प्रयाग चिखली में खास नंबर रखने की परंपरा अब केवल वाहनों तक सीमित नहीं है। कई लोगों ने अपने मोबाइल नंबर के आखिरी चार अंक भी गाड़ियों के नंबर से मिलाने शुरू कर दिए हैं।
सरपंच रोहित पाटिल के मुताबिक, उनके वाहनों के नंबर के आखिरी चार अंक 3500 हैं और उनके मोबाइल नंबर के अंतिम चार अंक भी यही हैं।
हालांकि, किसी परिवार की सभी गाड़ियों के नंबर के आखिरी चार अंक समान होने का मतलब यह नहीं है कि उनका पूरा पंजीकरण नंबर भी एक जैसा है। प्रत्येक वाहन का पूरा रजिस्ट्रेशन नंबर अलग होता है। इसके बावजूद आखिरी चार अंकों से परिवार की पहचान आसानी से हो जाती है।
किसान से लेकर कारोबारी तक, हर वर्ग में खास नंबर का शौक
इस परंपरा की खास बात यह है कि पसंदीदा नंबर रखने का चलन केवल संपन्न परिवारों तक सीमित नहीं है। गांव के किसान, मजदूर, छोटे दुकानदार, कारोबारी और नौकरीपेशा लोग भी अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार पसंदीदा नंबर हासिल करते हैं।
कोल्हापुर से करीब छह किलोमीटर दूर स्थित इस गांव की अनोखी परंपरा पहले भी चर्चा में आ चुकी है। साल 2018 और 2024 में भी यहां के वाहनों के खास नंबरों को लेकर खबरें सामने आई थीं। यानी यह कोई नया चलन नहीं, बल्कि पिछले तीन दशकों में विकसित हुई स्थानीय सामाजिक परंपरा है।
प्रयाग चिखली के लोगों के लिए गाड़ी का नंबर अब सिर्फ परिवहन विभाग की ओर से जारी पहचान नहीं रह गया है। यह परिवार की प्रतिष्ठा, पुरानी यादों और पीढ़ियों के बीच जुड़ाव का प्रतीक बन चुका है। यही वजह है कि यहां किसी गाड़ी की नंबर प्लेट देखकर उसके मालिक के साथ-साथ उसके परिवार की पहचान भी आसानी से हो जाती है।
Navyug Samachar
