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फिल्मों में दशकों पहले दिखाई गईं ये 5 तकनीकें आज बन चुकी हैं हकीकत, स्मार्टफोन से लेकर सेल्फ ड्राइविंग कार तक की कहानी है दिलचस्प

नेशनल डेस्क: आज के दौर में तकनीक जिस तेजी से बदल रही है, उसने इंसान की जिंदगी को पहले से कहीं ज्यादा आसान बना दिया है। स्मार्टफोन, वीडियो कॉलिंग और बिना ड्राइवर चलने वाली कार जैसी सुविधाएं अब आधुनिक जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई तकनीकों की कल्पना वैज्ञानिकों और इंजीनियरों से पहले फिल्मकारों और लेखकों ने कर ली थी। दशकों पहले फिल्मों में भविष्य की दुनिया दिखाने के लिए जिन उपकरणों और सुविधाओं को पर्दे पर उतारा गया था, उनमें से कई आज वास्तविकता बन चुके हैं। सिनेमा की कल्पनाओं ने किस तरह आधुनिक तकनीक को नई दिशा दी, आइए जानते हैं ऐसी पांच दिलचस्प मिसालों के बारे में।

1. स्मार्टफोन और स्मार्टवॉच की कल्पना पहले ही दिखा चुका था सिनेमा

आज स्मार्टफोन और स्मार्टवॉच के बिना रोजमर्रा की जिंदगी की कल्पना करना मुश्किल है। हालांकि, इन उपकरणों से मिलती-जुलती तकनीक की झलक कई दशक पहले ही विज्ञान आधारित धारावाहिकों और फिल्मों में दिखाई जा चुकी थी। स्टार ट्रेक में कम्युनिकेटर नाम का एक उपकरण दिखाया गया था, जिसके जरिए लोग बिना किसी तार के एक-दूसरे से बातचीत कर सकते थे। इसका आकार आज के फ्लिप फोन से मिलता-जुलता था।

इसी तरह डिक ट्रेसी के किरदार को कलाई पर पहनी जाने वाली घड़ी के माध्यम से वीडियो कॉल करते हुए दिखाया गया था। उस समय यह विचार कल्पना जैसा लगता था, लेकिन आगे चलकर मोबाइल फोन और स्मार्टवॉच ने ऐसी सुविधाओं को हकीकत में बदल दिया।

2. बिना ड्राइवर चलने वाली कार का सपना भी फिल्मों में दिखा

आज सेल्फ ड्राइविंग कार को आधुनिक तकनीक की बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है, लेकिन इसका विचार भी सिनेमा में काफी पहले सामने आ चुका था। वर्ष 1990 में रिलीज हुई फिल्म टोटल रिकॉल में जॉनी कैब नाम की ऐसी टैक्सी दिखाई गई थी, जिसमें कोई इंसानी ड्राइवर नहीं था। इस गाड़ी को रोबोटिक चालक संचालित करता था और यात्रियों को सिर्फ अपनी मंजिल बतानी होती थी।

उस समय यह तकनीक भविष्य की कल्पना मानी जाती थी। आज टेस्ला और गूगल जैसी कंपनियां स्वचालित वाहन तकनीक पर काम कर रही हैं। आधुनिक सेंसर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से वाहनों को खुद चलाने की दिशा में लगातार प्रगति हो रही है।

3. वीडियो कॉलिंग ने फिल्मों की कल्पना को बना दिया हकीकत

एक समय था जब दूर बैठे किसी व्यक्ति को देखकर बातचीत करना केवल फिल्मों में ही संभव नजर आता था। मेट्रोपोलिस और ब्लेड रनर जैसी फिल्मों में ऐसे उपकरण दिखाए गए थे, जिनकी मदद से लोग दूर बैठे व्यक्ति को स्क्रीन पर देखकर बातचीत कर सकते थे।

आज इंटरनेट और डिजिटल तकनीक ने इस कल्पना को आम लोगों तक पहुंचा दिया है। व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम, जूम और फेसटाइम जैसे मंचों के जरिए दुनिया के किसी भी हिस्से में मौजूद व्यक्ति से आमने-सामने बातचीत करना संभव हो गया है। वीडियो कॉलिंग अब केवल सुविधा नहीं, बल्कि रोजमर्रा के संवाद का अहम माध्यम बन चुकी है।

4. वीआर और एआर चश्मों से बदल रहा है दुनिया देखने का अंदाज

वर्ष 1989 में रिलीज हुई फिल्म बैक टू द फ्यूचर पार्ट-2 में भविष्य की ऐसी दुनिया दिखाई गई थी, जहां लोग खास तरह के चश्मे पहनकर स्क्रीन देखने और बातचीत करने जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल करते थे। उस दौर में यह तकनीक काफी अनोखी लगती थी।

आज वर्चुअल रियलिटी और ऑगमेंटेड रियलिटी के उपकरण इस कल्पना को वास्तविक अनुभव में बदल रहे हैं। एप्पल विजन प्रो, गूगल ग्लास और मेटा क्वेस्ट जैसे उपकरणों के माध्यम से लोग वास्तविक वातावरण के साथ डिजिटल दुनिया का भी अनुभव कर सकते हैं। इन तकनीकों का इस्तेमाल मनोरंजन से लेकर शिक्षा और दूसरे क्षेत्रों तक में किया जा रहा है।

5. टैबलेट और आईपैड की कल्पना भी फिल्मों में हुई थी साकार

आज टैबलेट और आईपैड पढ़ाई, काम और मनोरंजन के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले लोकप्रिय उपकरण हैं। लेकिन इनकी तरह दिखने वाली इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन की कल्पना वर्ष 1968 में आई फिल्म 2001: ए स्पेस ओडिसी में ही दिखाई गई थी।

फिल्म में अंतरिक्ष यात्रियों को न्यूजपैड नाम के एक पतले इलेक्ट्रॉनिक उपकरण पर खबरें पढ़ते हुए दिखाया गया था। उस समय इस तरह की डिवाइस का विचार बेहद नया था। बाद में तकनीक के विकास के साथ टैबलेट कंप्यूटर बाजार में आए और एप्पल आईपैड ने इस श्रेणी को नई पहचान दी।

सिनेमा की कल्पनाओं ने दिखाई भविष्य की राह

इन उदाहरणों से साफ होता है कि सिनेमा का योगदान केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा है। कई बार फिल्मकारों और लेखकों ने भविष्य की ऐसी तकनीकों की कल्पना की, जिन्हें वास्तविकता बनने में कई दशक लग गए। फिल्मों में दिखाई गई इन कल्पनाओं ने विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में नए विचारों को जन्म देने की प्रेरणा दी। आज हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी कई सुविधाएं कभी किसी लेखक या निर्देशक की कल्पना मात्र थीं।

 

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