Wednesday , 30 September 2026

मौत से पहले ही अपना पिंडदान क्यों कर लेते हैं लोग? गया के इस मंदिर में 3 दिन तक चलती है अनोखी आत्मश्राद्ध की परंपरा

बिहार डेस्क: पितृपक्ष के दौरान देशभर में लोग अपने दिवंगत परिजनों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। आमतौर पर पिंडदान का संबंध मृत व्यक्ति से माना जाता है, लेकिन बिहार के गया में एक ऐसी धार्मिक परंपरा भी है, जिसमें व्यक्ति जीवित रहते ही अपना आत्मश्राद्ध और पिंडदान कर सकता है। गया के भस्मकूट पर्वत पर स्थित जनार्दन मंदिर इस विशेष परंपरा के लिए जाना जाता है।

भगवान विष्णु के जनार्दन स्वरूप को समर्पित इस मंदिर में पितृपक्ष के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। गया में पितरों के लिए पिंडदान के कई धार्मिक स्थल हैं, लेकिन जनार्दन मंदिर की वेदी जीवित व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले आत्मश्राद्ध की परंपरा से जुड़ी मानी जाती है। यह मंदिर मां मंगला गौरी मंदिर के उत्तर दिशा में स्थित है।

किन लोग करते हैं अपना पिंडदान?

धार्मिक मान्यता के अनुसार, जिन लोगों की संतान नहीं है या जिन्हें आशंका है कि मृत्यु के बाद उनका पिंडदान करने वाला परिवार में कोई नहीं होगा, वे जीवन रहते अपना पिंडदान कर सकते हैं। इसके अलावा संन्यास या वैराग्य का मार्ग अपनाने वाले लोगों द्वारा भी इस परंपरा का पालन किए जाने की मान्यता है।

मान्यता है कि पिंडदान और तर्पण के जरिए पितरों की शांति और मुक्ति की कामना की जाती है। इसी धार्मिक विश्वास के चलते कुछ लोग अपनी मृत्यु से पहले ही अपने लिए पिंडदान की यह प्रक्रिया पूरी करते हैं।

तीन दिनों में पूरी होती है आत्मश्राद्ध की रस्म

मान्यता के अनुसार आत्मश्राद्ध की प्रक्रिया करीब तीन दिनों में पूरी होती है। इसकी शुरुआत गया पहुंचकर वैष्णव सिद्धि का संकल्प लेने और अपने पापों के प्रायश्चित की प्रार्थना से की जाती है। इसके बाद जनार्दन स्वामी मंदिर में पूजा-पाठ और जाप किया जाता है।

इस प्रक्रिया में दही और चावल से तीन पिंड तैयार किए जाते हैं और उन्हें भगवान को अर्पित किया जाता है। इस पिंडदान की एक खास बात यह बताई जाती है कि इसमें तिल का इस्तेमाल नहीं किया जाता।

पिंड अर्पित करते समय श्रद्धालु भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे जीवन रहते ही अपने लिए यह धार्मिक कर्म पूरा कर रहे हैं और मृत्यु के बाद भगवान की कृपा से उन्हें मोक्ष प्राप्त हो।

 

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