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14 साल के जुड़वां भाइयों ने कर दिखाया कमाल! पानी से 9 गुना ज्यादा असरदार हाइड्रोजेल बनाया, जंगल की आग रोकने में मिलेगी मदद

अमेरिका: महज 14 साल की उम्र में कैलिफोर्निया के जुड़वां भाइयों हेनरी और जैक ग्रोवर ने ऐसा नवाचार किया है, जो भविष्य में जंगलों में लगने वाली भीषण आग से निपटने में मददगार साबित हो सकता है। दोनों ने एक विशेष हाइड्रोजेल तैयार किया है, जो गर्म सतहों पर नमी को लंबे समय तक बनाए रखता है। नियंत्रित परीक्षण में यह साधारण पानी की तुलना में नौ गुना अधिक समय तक आग को दोबारा भड़कने से रोकने में सफल रहा। जहां पानी से बुझाया गया गर्म चारकोल तीन मिनट में फिर सुलग उठा, वहीं हाइड्रोजेल से उपचारित चारकोल को दोबारा जलने में 27 मिनट लगे।

घर तक पहुंची जंगल की आग ने दिया नया प्रयोग करने का विचार

हेनरी और जैक कैलिफोर्निया की रिवरसाइड STEM अकादमी में आठवीं कक्षा के छात्र हैं। कुछ समय पहले जंगल में लगी आग के कारण उनका अपना घर भी खतरे में आ गया था। इस घटना ने दोनों को जंगल की आग के कारणों और आग बुझने के बाद भी उसके दोबारा भड़कने की आशंकाओं को समझने के लिए प्रेरित किया।

अध्ययन के दौरान उन्हें पता चला कि आग बुझने के कई घंटे या दिन बाद भी लकड़ियों, सूखी पत्तियों और अन्य ज्वलनशील पदार्थों में गर्मी बनी रह सकती है। हवा और अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर ये सुलगते अवशेष फिर से आग पकड़ सकते हैं और बड़ी वनाग्नि का कारण बन सकते हैं।

साल 2025 में कैलिफोर्निया में लगी विनाशकारी पैलिसेड्स आग के दौरान पहले बुझ चुकी आग के दोबारा भड़कने की घटना ने भी दोनों भाइयों को इस दिशा में शोध करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने ऐसे पदार्थ की तलाश शुरू की, जो गर्म सतहों पर पानी को अधिक समय तक रोक सके और आग के दोबारा भड़कने की आशंका कम कर सके।

नौ प्रकार के हाइड्रोजेल आजमाए, सोडियम पॉलीएक्रिलेट निकला सबसे प्रभावी

अपने प्रयोग के दौरान हेनरी और जैक ने नौ अलग-अलग प्रकार के हाइड्रोजेल का परीक्षण किया। इसके लिए उन्होंने सभी पदार्थों को पानी में भिगोकर उनका वजन मापा। इसके बाद उन्हें गर्म ओवन में सुखाया गया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि कौन-सा पदार्थ कितनी देर तक नमी बनाए रख सकता है। दोनों ने पत्तियों पर जेल लगाकर उसकी चिपकने की क्षमता भी जांची।

परीक्षण के बाद सोडियम पॉलीएक्रिलेट सबसे प्रभावी पदार्थ के रूप में सामने आया। यह एक विशेष बहुलक है, जो अपने वजन से कई गुना अधिक पानी सोखने की क्षमता रखता है। प्रयोग के दौरान इस पदार्थ को पूरी तरह पानी सोखने में लगभग 15 मिनट लगे।

इसके बाद दोनों भाइयों ने गर्म चारकोल पर इसका परीक्षण किया। साधारण पानी से बुझाया गया चारकोल तीन मिनट बाद फिर जल उठा, जबकि हाइड्रोजेल से उपचारित चारकोल 27 मिनट तक दोबारा नहीं सुलगा। इस तरह नियंत्रित परिस्थितियों में हाइड्रोजेल ने पानी के मुकाबले नौ गुना अधिक समय तक आग के दोबारा भड़कने में देरी की।

3D प्रिंटर से बनाया खास स्प्रे उपकरण, 18.3 मीटर दूर तक पहुंचेगा जेल

हाइड्रोजेल को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने के लिए दोनों भाइयों ने त्रि-आयामी प्रिंटर की मदद से एक विशेष छिड़काव उपकरण भी तैयार किया है। इस उपकरण के जरिए हाइड्रोजेल को लगभग 18.3 मीटर की दूरी तक पहुंचाया जा सकता है।

इस तकनीक का संभावित फायदा अग्निशमन कर्मियों को मिल सकता है। उन्हें गर्म और खतरनाक इलाकों के ज्यादा करीब गए बिना ही प्रभावित सतहों पर हाइड्रोजेल का छिड़काव करने में मदद मिल सकती है। इससे आग बुझाने के बाद सुलगते स्थानों को ठंडा रखने और दोबारा आग पकड़ने की आशंका कम करने में सहायता मिलने की उम्मीद है।

अमेरिकी प्रतियोगिता में छाए दोनों भाई, मिले 20 हजार डॉलर

हेनरी और जैक के इस नवाचार ने उन्हें अमेरिका की प्रतिष्ठित ‘थर्मो फिशर साइंटिफिक जूनियर इनोवेटर्स चैलेंज 2026’ के 30 अंतिम प्रतिभागियों में जगह दिलाई। इस प्रतियोगिता में करीब दो हजार लोगों ने आवेदन किया था। इसका अंतिम चरण 23 से 28 अक्टूबर के बीच वॉशिंगटन में आयोजित हुआ।

प्रतियोगिता में हेनरी को ‘ब्रॉडकॉम कोडिंग विद कमिटमेंट अवॉर्ड’ से सम्मानित किया गया, जबकि जैक को ‘डाउ STEM टैलेंट अवॉर्ड’ मिला। दोनों भाइयों को अलग-अलग 10 हजार डॉलर की पुरस्कार राशि दी गई। इस तरह उन्हें कुल 20 हजार डॉलर मिले। उनके विद्यालय को भी विज्ञान और तकनीकी शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए एक हजार डॉलर का अनुदान दिया गया है।

भारत के जंगलों में भी मददगार हो सकती है यह तकनीक

भारत में जंगलों में आग लगना एक गंभीर चुनौती है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और पूर्वोत्तर के वन क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान आग की घटनाएं सामने आती हैं। सूखी पत्तियां, घास और दूसरी ज्वलनशील वनस्पतियां आग को तेजी से फैलने का मौका देती हैं।

भारतीय वन सर्वेक्षण उपग्रहों के माध्यम से जंगलों में आग की निगरानी करता है और समय-समय पर चेतावनी जारी करता है। पर्यावरण मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, नवंबर 2023 से जून 2024 के बीच बड़ी वनाग्नि की घटनाओं में लगभग 67 प्रतिशत आग को 24 घंटे के भीतर बुझा दिया गया था। इससे पहले की तुलनीय अवधि में यह आंकड़ा 33 प्रतिशत था।

ऐसे में आग बुझने के बाद भी सुलगते स्थानों पर नजर रखने और उन्हें दोबारा आग पकड़ने से बचाने के लिए हाइड्रोजेल उपयोगी विकल्प बन सकता है। हालांकि, भारत में इसके इस्तेमाल से पहले यहां के जंगलों की वनस्पति, तापमान, जमीन की प्रकृति और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप अलग से परीक्षण करना जरूरी होगा।

पर्यावरण के लिए कितना सुरक्षित है हाइड्रोजेल? उठे वैज्ञानिक जांच के सवाल

इस तकनीक की संभावनाओं के साथ इसके पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर सावधानी बरतना भी जरूरी है। हेनरी और जैक ने जिस सोडियम पॉलीएक्रिलेट का इस्तेमाल किया है, वह कृत्रिम बहुलक है। ऐसे में वैज्ञानिक परीक्षण के बिना इसे पूरी तरह जैविक रूप से नष्ट होने वाला या पर्यावरण के लिए सुरक्षित नहीं माना जा सकता।

बड़े वन क्षेत्रों में इसका छिड़काव करने से पहले मिट्टी, जलस्रोतों और जीव-जंतुओं पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का अध्ययन करना जरूरी होगा।

जंगल की आग से बचाव के लिए वैज्ञानिक पहले से ही ऐसे पदार्थों पर शोध कर रहे हैं, जो पानी को लंबे समय तक रोक सकें और आग के फैलाव को धीमा कर सकें। जनवरी 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में अधिक चिपकने वाले सोडियम पॉलीएक्रिलेट हाइड्रोजेल की अग्निरोधी क्षमता की जांच की गई थी। वहीं, नवंबर 2026 में सामने आए एक वैज्ञानिक शोध में समुद्री शैवाल से प्राप्त सोडियम एल्जिनेट आधारित हाइड्रोजेल के उत्साहजनक परिणाम बताए गए हैं। इन अध्ययनों से स्पष्ट होता है कि आग से बचाव के लिए हाइड्रोजेल का इस्तेमाल वैज्ञानिक शोध का अहम विषय बन रहा है।

अभी शुरुआती प्रयोग तक सीमित है तकनीक, बड़े स्तर पर परीक्षण बाकी

हेनरी और जैक का हाइड्रोजेल आधारित आविष्कार फिलहाल प्रयोग के स्तर पर है। जंगलों में लगने वाली वास्तविक आग, तेज हवाओं, अत्यधिक तापमान और बड़े क्षेत्रों में इसके प्रदर्शन को लेकर अभी पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए नियंत्रित परीक्षण में मिले 27 मिनट के परिणाम को हर तरह की वनाग्नि पर लागू नहीं किया जा सकता।

इसके बावजूद दोनों किशोरों का प्रयोग दिखाता है कि वैज्ञानिक सोच और सीमित संसाधनों की मदद से भी प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के नए रास्ते खोजे जा सकते हैं। यदि आगे के परीक्षणों में यह तकनीक प्रभावी और पर्यावरण के अनुकूल साबित होती है, तो जंगलों में आग बुझाने के बाद उसके दोबारा भड़कने का खतरा कम करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।

 

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