
धर्म डेस्क : सनातन परंपरा में दशमहाविद्याओं का विशेष महत्व माना जाता है और इन्हीं में सातवीं महाविद्या के रूप में मां धूमावती की आराधना की जाती है। उनका स्वरूप अन्य देवियों की तुलना में बेहद रहस्यमयी, उग्र और अद्वितीय माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां धूमावती की उपासना से दुख, कष्ट, शत्रु बाधा और जीवन की अनेक परेशानियों से मुक्ति प्राप्त होती है। इस वर्ष धूमावती जयंती 22 जून को मनाई जाएगी।
दशमहाविद्याओं में सातवां स्वरूप हैं मां धूमावती
धर्म शास्त्रों के अनुसार मां धूमावती को दस महाविद्याओं में सातवीं शक्ति माना गया है। गुप्त नवरात्रि और विशेष तांत्रिक साधनाओं में उनकी पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। माना जाता है कि उनकी कृपा से साधक को संकटों से राहत मिलती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।
मां धूमावती की उत्पत्ति की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश पर विहार कर रहे थे। उसी दौरान माता पार्वती को तीव्र भूख लगी। उन्होंने भगवान शिव से भोजन की इच्छा व्यक्त की, लेकिन शिव ने कुछ समय प्रतीक्षा करने को कहा।
कथा के अनुसार भूख इतनी बढ़ गई कि माता पार्वती ने भगवान शिव को ही निगल लिया। भगवान शिव के भीतर स्थित विष के प्रभाव से माता पार्वती का शरीर धुएं के समान काला पड़ गया। कहा जाता है कि इसी विकट और धूम्र स्वरूप से मां धूमावती प्रकट हुईं।
कैसे की जाती है मां धूमावती की पूजा?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मां धूमावती की पूजा सामान्य देवी-देवताओं की पूजा से कुछ अलग मानी जाती है। उनकी आराधना करते समय साधक को पश्चिम दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। पूजा के दौरान काले रंग के वस्त्र धारण करने की परंपरा भी बताई जाती है।
पूजा स्थल पर मां धूमावती की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर दीपक और धूप अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद मंत्र जाप और स्तुति के माध्यम से देवी की उपासना की जाती है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक पूजा करने से जीवन के कष्ट, दुख और दरिद्रता दूर होती है।
सुहागिन महिलाएं क्यों नहीं करतीं मां धूमावती की पूजा?
धार्मिक ग्रंथों और लोक मान्यताओं के अनुसार मां धूमावती को वैधव्य स्वरूप की देवी माना जाता है। यही कारण है कि परंपरागत रूप से सुहागिन महिलाएं उनकी पूजा नहीं करतीं। माना जाता है कि उनका स्वरूप अत्यंत उग्र और तपस्वी है, जो त्याग, वैराग्य और जीवन के कठिन पक्षों का प्रतीक माना जाता है।
शास्त्रीय मान्यताओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि मां धूमावती की शक्ति अत्यंत प्रबल और प्रभावशाली है। इसी कारण उनकी साधना विशेष नियमों और विधियों के अंतर्गत की जाती है। हालांकि श्रद्धा और भक्ति के साथ उनकी आराधना करने वाले भक्तों पर मां धूमावती की विशेष कृपा होने की मान्यता भी प्रचलित है।
तांत्रिक साधना में विशेष महत्व
धार्मिक परंपराओं में मां धूमावती का विशेष स्थान तांत्रिक साधना और गूढ़ उपासना पद्धतियों में माना गया है। तंत्र साधक उन्हें संकटों का नाश करने वाली और बाधाओं को समाप्त करने वाली देवी के रूप में पूजते हैं। मान्यता है कि उनकी साधना से साधक को मानसिक दृढ़ता, सुरक्षा और कठिन परिस्थितियों से लड़ने की शक्ति प्राप्त होती है।
Navyug Samachar