
धर्म डेस्क: हिंदू धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान के लिए बेहद पवित्र समय माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु अपने पितरों की शांति और आशीर्वाद की कामना से विधि-विधान के साथ श्राद्ध कर्म करते हैं। मान्यता है कि श्राद्ध के समय तैयार किए गए भोजन को सबसे पहले चार भागों में बांटकर कौआ, गाय, कुत्ता और कन्या को अर्पित किया जाता है। इसके पीछे गहरी धार्मिक मान्यता और शास्त्रीय आधार बताया गया है।
गरुड़ पुराण में मिलता है उल्लेख
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गरुड़ पुराण में श्राद्ध के दौरान कौए को भोजन कराने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि यदि कौआ श्रद्धापूर्वक अर्पित किया गया भोजन ग्रहण कर ले, तो इसे इस बात का संकेत माना जाता है कि पूर्वज प्रसन्न हैं और अपने वंशजों को आशीर्वाद दे रहे हैं। इसलिए तर्पण और पिंडदान के साथ कौए को भोजन कराना भी श्राद्ध कर्म का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
क्यों कराया जाता है पशु-पक्षियों को भोजन?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह परंपरा ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना से जुड़ी हुई है। सनातन परंपरा में पूजा के दौरान प्रकृति और समस्त जीव-जंतुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा रही है। वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी और आकाश जैसे पंचतत्वों के साथ विभिन्न जीवों का भी सम्मान किया जाता है।
मान्यता है कि गाय पवित्रता और शुभता का प्रतीक है, कुत्ता निष्ठा और समर्पण का प्रतीक माना जाता है, जबकि कौआ वातावरण की शुद्धि और पितरों का प्रतिनिधि माना जाता है। वहीं कन्या या अतिथि को भोजन कराना सम्मान और सेवा की भावना का प्रतीक माना जाता है।
विष्णु पुराण में भी बताया गया है महत्व
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, विष्णु पुराण में भी श्राद्ध पक्ष के दौरान श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार भोजन कराने का महत्व बताया गया है। मान्यता है कि श्राद्ध के 16 दिनों तक कौआ समेत अन्य जीवों को पितरों का प्रतीक मानकर भोजन कराने से पूर्वज प्रसन्न होते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
गरुड़ पुराण में यह भी उल्लेख मिलता है कि यमराज ने कौए को वरदान दिया था कि जो व्यक्ति उसे भोजन कराएगा, उसका अर्पित भोजन सीधे उसके पूर्वजों तक पहुंचेगा। ऐसी मान्यता है कि इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और पितृ दोष तथा कालसर्प दोष से भी मुक्ति मिलने की मान्यता है।
रामायण से जुड़ी है एक प्रचलित कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस परंपरा का संबंध रामायण की एक कथा से भी जोड़ा जाता है। कथा के अनुसार, एक बार एक कौए ने माता सीता के चरणों में चोंच मार दी थी। इसे देखकर भगवान श्रीराम ने अपने बाण से कौए की एक आंख को क्षति पहुंचाई। बाद में कौए ने अपनी भूल स्वीकार करते हुए श्रीराम से क्षमा मांगी।
मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद दिया कि कलयुग में जो व्यक्ति सबसे पहले कौए को भोजन कराएगा, उसके पूर्वज सदैव प्रसन्न रहेंगे और उसे अपना आशीर्वाद देंगे। तभी से श्राद्ध के दौरान सबसे पहले कौए को भोजन कराने की परंपरा प्रचलित मानी जाती है।
Navyug Samachar