
धर्म डेस्क: श्रावण मास में भगवान शिव की आराधना के बीच नाग पंचमी का पर्व विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इस दिन नाग देवता की पूजा की जाती है, वहीं भगवान शिव के गले में विराजमान नाग का स्मरण भी किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में शिव के गले का नाग केवल आभूषण नहीं माना गया है, बल्कि इसे निर्भयता, शक्ति, धैर्य, नियंत्रण और प्रकृति के साथ संतुलन का प्रतीक माना जाता है। नाग और महादेव के संबंध से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं समुद्र मंथन और भगवान शिव के नीलकंठ स्वरूप से भी जुड़ी हैं।
श्रावण शुक्ल पंचमी को मनाई जाती है नाग पंचमी
हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी का पर्व मनाया जाता है। हिंदू धर्म में इसे प्रमुख पर्वों में शामिल किया जाता है। इस दिन नाग देवता की पूजा कर परिवार की सुख-शांति, सुरक्षा और सर्प भय से मुक्ति की कामना की जाती है।
नाग पंचमी का भगवान शिव से भी गहरा संबंध माना जाता है। भगवान शिव की प्रतिमा और चित्रों में उनके गले में लिपटा नाग प्रमुखता से दिखाई देता है। धार्मिक परंपराओं में शिव के साथ दिखाई देने वाले इस नाग को उनके स्वरूप का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।
महादेव के गले में क्यों विराजते हैं नाग?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव के गले में विराजमान नाग को वासुकी नाग कहा जाता है। शिव के गले में नाग का यह स्वरूप कई प्रतीकात्मक अर्थों से जोड़ा जाता है।
सर्प को आमतौर पर भय का प्रतीक माना जाता है, लेकिन महादेव के गले में वही नाग निर्भयता और नियंत्रण का संदेश देता है। भगवान शिव योग, तप और वैराग्य के प्रतीक माने जाते हैं। ऐसे में उनके गले में नाग का होना इस बात का प्रतीक माना जाता है कि उन्होंने भय, अहंकार और मृत्यु जैसी शक्तियों पर नियंत्रण प्राप्त कर लिया है।
नाग को ऊर्जा और परिवर्तन से भी जोड़कर देखा जाता है। इसी वजह से भगवान शिव के इस स्वरूप को शक्ति, धैर्य और संतुलन का प्रतीक माना जाता है।
समुद्र मंथन में वासुकी नाग की थी अहम भूमिका
भगवान शिव और नागों के संबंध से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन का प्रसंग शामिल है। मान्यता के अनुसार देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया था। इस मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी के रूप में इस्तेमाल किया गया था।
समुद्र मंथन के दौरान सबसे पहले भयंकर विष निकला, जिसे हलाहल विष कहा गया। विष का प्रभाव इतना प्रचंड था कि देवता और असुर दोनों चिंतित हो गए। संसार को इसके प्रभाव से बचाने के लिए भगवान शिव ने हलाहल विष को अपने कंठ में धारण कर लिया।
शिव ने विष को अपने शरीर में फैलने से रोकते हुए उसे कंठ में ही रोक लिया। इसके कारण उनका कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। अलग-अलग पुराणों और लोक परंपराओं में इस प्रसंग का विवरण अलग-अलग रूपों में मिलता है, लेकिन समुद्र मंथन और भगवान शिव के नीलकंठ स्वरूप का संबंध व्यापक रूप से प्रसिद्ध है।
लोकमान्यता में नाग को भगवान शिव के कंठ की रक्षा और विष के प्रभाव को नियंत्रित करने वाले प्रतीक के तौर पर भी देखा जाता है। यही वजह है कि नाग और महादेव का संबंध नाग पंचमी की धार्मिक मान्यताओं में विशेष स्थान रखता है।
नाग पंचमी पर नाग देवता की पूजा क्यों की जाती है?
नाग पंचमी पर नाग देवता की पूजा की परंपरा देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरीके से निभाई जाती है। कुछ स्थानों पर नाग की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर पूजा की जाती है, जबकि कई जगह घर के दरवाजे या दीवार पर नाग का चित्र बनाकर पूजन किया जाता है।
कई क्षेत्रों में नाग देवता को दूध, फूल, अक्षत, मिठाई और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार नाग देवता की पूजा करने से परिवार की रक्षा होती है और सर्प भय से मुक्ति मिलती है।
नाग पंचमी पर खेतों में हल क्यों नहीं चलाया जाता?
नाग पंचमी से जुड़ी एक महत्वपूर्ण लोक परंपरा खेती-किसानी से संबंधित है। देश के कई क्षेत्रों में इस दिन खेतों में हल नहीं चलाया जाता। इसके पीछे मान्यता है कि जमीन के भीतर रहने वाले सांपों और अन्य जीव-जंतुओं को नुकसान से बचाया जा सके।
यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता का संदेश भी देती है। सांप खेतों के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं और चूहों जैसे कई जीवों की संख्या नियंत्रित करने में उनकी भूमिका होती है।
नाग पंचमी पर शिव पूजा का क्या है संबंध?
नाग पंचमी के अवसर पर कई श्रद्धालु नाग देवता के साथ भगवान शिव की भी पूजा करते हैं। इस दिन शिवलिंग पर जल चढ़ाने, बेलपत्र अर्पित करने और भगवान शिव का स्मरण करने की परंपरा है।
नाग पंचमी पर शिव के गले में विराजमान नाग का स्मरण महादेव के उस स्वरूप को समझने का अवसर देता है, जिसमें सामान्य तौर पर भय का प्रतीक माने जाने वाले जीव को सम्मानजनक स्थान मिला है।
नाग पंचमी की धार्मिक भावना में इसी कारण प्रकृति, जीव-जंतुओं और मनुष्य के बीच संतुलन का संदेश भी जुड़ा हुआ माना जाता है। यह पर्व नाग देवता की पूजा के साथ जीव-जंतुओं के प्रति सम्मान और संरक्षण की भावना से भी जोड़ा जाता है।
Navyug Samachar