नई दिल्ली: दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि भारत में लगातार घटती प्रजनन दर और बदलती जनसांख्यिकीय परिस्थितियों को देखते हुए ऐसे कानूनों की प्रासंगिकता अब खत्म होती नजर आ रही है। मौजूदा हालात में इन कानूनों की फिर से समीक्षा करने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की।तीसरा बच्चा होने पर पूर्व सरपंच को किया गया था अयोग्य
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ महाराष्ट्र की काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी। उन्हें तीसरा बच्चा होने के कारण पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के कानून के तहत उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही पर रोक लगा दी। इसी दौरान अदालत ने कहा कि पिछले दो दशकों में देश की जनसांख्यिकीय स्थिति में काफी बदलाव आया है और जनसंख्या विस्फोट का पुराना डर अब पहले जैसा नहीं रह गया है।
प्रजनन दर 3 से घटकर 1.9 पर पहुंची
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि भारत की कुल प्रजनन दर पिछले कुछ दशकों में लगातार कम हुई है। पहले जहां यह दर करीब 3 बच्चे प्रति महिला थी, वहीं अब घटकर लगभग 1.9 रह गई है। ऐसे में दो से अधिक बच्चे होने पर किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले कानूनों की मौजूदा परिस्थितियों में प्रासंगिकता पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए।
अदालत के मुताबिक, जब ये कानून बनाए गए थे, तब जनसंख्या नियंत्रण एक महत्वपूर्ण नीतिगत मुद्दा था। लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं और देश में प्रजनन दर में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है।
2003 के जावेद बनाम हरियाणा मामले की भी होगी समीक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में जावेद बनाम हरियाणा सरकार मामले में दिए गए फैसले को भी बड़ी पीठ के पास समीक्षा के लिए भेज दिया है। उस समय तीन न्यायाधीशों की पीठ ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के उस प्रावधान को सही ठहराया था, जिसके तहत दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर व्यक्ति को पंचायत चुनाव लड़ने से रोक दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि जब जावेद मामले में फैसला सुनाया गया था, तब देश की कुल प्रजनन दर लगभग 3 बच्चे प्रति महिला थी। उस समय जनसंख्या नियंत्रण को लेकर सरकार की नीतियों में ऐसे प्रतिबंधों को महत्वपूर्ण माना गया था।
हालांकि, पिछले दो दशकों में जनसांख्यिकीय परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया है। प्रजनन दर में गिरावट के कारण अब इन कानूनों की उपयोगिता और औचित्य पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत महसूस की जा रही है।
Navyug Samachar