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ट्रंप की चुनावी हार से औंधे मुंह गिरा कच्चा तेल! एक ही दिन में 10% तक टूटी कीमतें, भारत को मिल सकती है बड़ी राहत

नेशनल डेस्क: नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। अमेरिकी मध्यावधि चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को मिली हार के बाद वैश्विक तेल बाजार में हलचल तेज हो गई है। इस चुनावी नतीजे से ईरान के साथ जारी युद्ध जल्द खत्म होने की उम्मीदों को बल मिला है। इसके चलते कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ा और ब्रेंट क्रूड एक ही दिन में करीब 10 प्रतिशत तक सस्ता हो गया।

कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमत गिरकर 93.22 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई। यह करीब दो महीने का सबसे निचला स्तर है। वहीं, अमेरिकी कच्चा तेल वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी डब्ल्यूटीआई भी 90 डॉलर प्रति बैरल के नीचे फिसल गया। इस गिरावट के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का भाव 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया।

भारत के लिए क्यों अहम है कच्चे तेल की गिरावट?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में आई नरमी को भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों के लिए राहत भरा संकेत माना जा रहा है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से आयात करता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से देश का आयात बिल और ईंधन की लागत बढ़ जाती है। मौजूदा गिरावट से फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों में और बढ़ोतरी का दबाव कम हो सकता है। हालांकि, घरेलू बाजार में ईंधन की कीमतें केवल अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल के भाव पर निर्भर नहीं करतीं, बल्कि कई अन्य आर्थिक और व्यावसायिक कारक भी इन्हें प्रभावित करते हैं।

ईरान युद्ध को लेकर अमेरिकी राजनीति में बढ़ी हलचल

अमेरिकी चुनाव के नतीजों के बाद ईरान युद्ध और अमेरिका-इजरायल संबंधों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि ईरान युद्ध और अमेरिका-इजरायल संबंधों को लेकर मतदाताओं की नाराजगी ने रिपब्लिकन पार्टी के चुनावी प्रदर्शन को नुकसान पहुंचाया। वहीं, सीनेट में डेमोक्रेटिक नेता चक शूमर ने संघर्ष समाप्त करने का वादा किया है। ईरान से जुड़ा यह युद्ध अब नौवें महीने में प्रवेश कर चुका है।

ट्रंप की धमकी से पहले बढ़ गए थे तेल के दाम

अक्टूबर में डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान पर नए हमले करने की धमकी दिए जाने के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत छह महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी। उस समय मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने से तेल आपूर्ति बाधित होने की आशंका पैदा हो गई थी। हालांकि, मध्यावधि चुनाव के दौरान ट्रंप ने संकेत दिया कि फिलहाल ईरान पर हमले तेज करने की उनकी कोई योजना नहीं है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि युद्ध को लेकर लोगों की नाराजगी का असर उनकी पार्टी के चुनावी प्रदर्शन पर पड़ा है।

फारस की खाड़ी से बढ़ने लगा कच्चे तेल का निर्यात

इस बीच फारस की खाड़ी से कच्चे तेल का निर्यात फिर बढ़ने लगा है। अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष जारी रहने के बावजूद मध्य पूर्व से तेल की आपूर्ति में सुधार देखने को मिला है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ा है। हालांकि, पेट्रोल और डीजल जैसे तैयार ईंधन की आपूर्ति अभी भी प्रभावित है। ऐसे में कच्चे तेल के सस्ते होने के बावजूद रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों के बाजार की चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।

रूस की रिफाइनरियों पर यूक्रेन के हमलों से बढ़ी परेशानी

दूसरी ओर, रूस की रिफाइनरियों पर यूक्रेन के बढ़ते हमलों ने पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति को प्रभावित किया है। इसके चलते तैयार ईंधन की कीमतों में तेजी बनी हुई है। इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और उससे तैयार होने वाले पेट्रोलियम उत्पादों की स्थिति अलग-अलग बनी हुई है। जहां कच्चे तेल के दाम नीचे आ रहे हैं, वहीं रिफाइंड ईंधन की आपूर्ति से जुड़ी परेशानियां बरकरार हैं।

अमेरिका में डीजल का भंडार 100 मिलियन बैरल से नीचे

अमेरिका में ईंधन भंडार की स्थिति भी चिंता बढ़ा रही है। वहां कच्चे तेल का भंडार लगातार पांचवें सप्ताह घटा है। इसके अलावा डीजल और अन्य डिस्टिलेट ईंधनों का स्टॉक 100 मिलियन बैरल से नीचे पहुंच गया है। बताया गया है कि यह वर्ष 2003 के बाद का सबसे निचला स्तर है। भंडार में लगातार गिरावट से पेट्रोलियम उत्पादों की उपलब्धता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

इस तरह अमेरिकी चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की हार, ईरान युद्ध को लेकर बदलते राजनीतिक संकेत और मध्य पूर्व से कच्चे तेल के निर्यात में सुधार ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों को नीचे ला दिया है। हालांकि, रूस की रिफाइनरियों पर हमले और अमेरिका में घटते ईंधन भंडार के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार की चुनौतियां अभी बरकरार हैं।

 

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