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त्रेता से द्वापर तक जुड़ी आस्था की अनोखी कहानी! इन दो शिवलिंगों से जुड़ी मान्यताएं आज भी करती हैं लोगों को आकर्षित

धर्म डेस्क: मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित जामगढ़ और भगदेई गांव अपने प्राचीन शिव मंदिरों और उनसे जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के कारण श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र माने जाते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इन दोनों शिवलिंगों की स्थापना भगवान शिव के परम भक्त जामवंत ने अलग-अलग युगों में की थी। सावन, महाशिवरात्रि और प्रत्येक सोमवार को यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

200 मीटर ऊंचाई पर स्थित है त्रेता युग से जुड़ा शिवलिंग

विंध्याचल पर्वतमाला पर जामगढ़ गांव में लगभग 200 मीटर की ऊंचाई पर स्थित शिव गुफा मंदिर को स्थानीय लोग त्रेता युग से जुड़ा मानते हैं। जनश्रुति के अनुसार, जामवंत ने यहां शिवलिंग की स्थापना कर कठोर तपस्या की थी।

मंदिर परिसर के पास स्थित एक कुंड में पूरे वर्ष पानी भरा रहता है और इसी जल से भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। गुफा के भीतर एक स्थान से लगातार पानी की बूंदें टपकती रहती हैं। स्थानीय मान्यता है कि इस जल के सेवन से दमा, हृदय रोग और त्वचा संबंधी बीमारियों सहित कई रोगों में लाभ मिलता है। हालांकि, इन दावों की वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।

देवी-देवताओं की आरती होने की भी है मान्यता

स्थानीय लोगों का विश्वास है कि प्रातःकाल इस गुफा में देवी-देवताओं द्वारा आरती की जाती है। ग्रामीणों के अनुसार, कई श्रद्धालुओं ने यहां दिव्य दृश्य देखने का दावा भी किया है। यह मान्यता लंबे समय से क्षेत्र की धार्मिक परंपराओं का हिस्सा रही है।

गाय गुफा से जुड़ी प्रचलित कथा

मंदिर के समीप स्थित गाय गुफा को लेकर भी एक प्रसिद्ध लोककथा प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, एक गाय प्रतिदिन इस गुफा से निकलकर गांव की अन्य गायों के साथ चरने जाती थी। एक दिन एक चरवाहा उसकी पूंछ पकड़कर गुफा के भीतर पहुंच गया, जहां साधु-संत भजन-कीर्तन कर रहे थे।

कथा के अनुसार, संतों ने चरवाहे को भस्म देकर उसे अपने अन्न भंडार में रखने के लिए कहा। इसके बाद उसका अनाज एक वर्ष तक समाप्त नहीं हुआ। स्थानीय लोग इस कथा को आज भी श्रद्धा के साथ सुनाते हैं।

भगदेई का शिव मंदिर भी आस्था का प्रमुख केंद्र

जामगढ़ से कुछ दूरी पर स्थित भगदेई गांव का प्राचीन शिव मंदिर भी जामवंत से जुड़ा माना जाता है। स्थानीय मान्यता है कि द्वापर युग में जामवंत ने एक ही रात में इस मंदिर का निर्माण शुरू किया था, लेकिन इसका शिखर अधूरा रह गया।

जनश्रुति के अनुसार, निर्माण के दौरान उनकी बहन वहां पहुंच गईं, जिसके बाद जामवंत ने लंबी छलांग लगाई। मंदिर से करीब 500 मीटर दूर एक चट्टान पर उनके पैरों के निशान होने का दावा किया जाता है। वहीं, मंदिर परिसर के आसपास मौजूद एक शिलालेख अब तक पढ़ा नहीं जा सका है।

स्थापत्य को लेकर इतिहासकारों की अलग-अलग राय

मंदिर की स्थापत्य शैली को लेकर विशेषज्ञों के अलग-अलग मत हैं। कुछ इतिहासकार इसे 9वीं-10वीं शताब्दी के गुर्जर-प्रतिहार काल का मानते हैं, जबकि कुछ विद्वान इसे इससे भी अधिक प्राचीन बताते हैं। मंदिर की नक्काशी और शिल्पकला पर खजुराहो शैली का प्रभाव भी देखा जाता है।

सूर्योदय की पहली किरण से शिवाभिषेक की मान्यता

स्थानीय मान्यता के अनुसार, भगदेई शिव मंदिर में प्रतिदिन सूर्योदय की पहली किरण सीधे शिवलिंग पर पड़ती है, जिसे प्राकृतिक शिवाभिषेक के रूप में देखा जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से पूजा-अर्चना करने पर भगवान शिव भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

 

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