
नेशनल डेस्क: भारत में डिजिटल भुगतान का सबसे बड़ा माध्यम बन चुके UPI के बीच नकदी को लेकर एक अहम तस्वीर सामने आई है। UPI के इस्तेमाल में लगातार बढ़ोतरी के बावजूद जनता के पास मौजूद नकदी भी बढ़ रही है। ऐसे में 2,000 रुपये से अधिक के कुछ मर्चेंट UPI भुगतान पर MDR यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट की नई व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं कि क्या डिजिटल भुगतान की लागत बढ़ने पर व्यापारी और ग्राहक दोबारा कैश की ओर रुख कर सकते हैं।
अगर ऐसा होता है तो इसका असर केवल ग्राहक या व्यापारी तक सीमित नहीं रहेगा। नकदी की मांग बढ़ने पर देश में चलन में मौजूद मुद्रा, नोटों की जरूरत और उन्हें संभालने से जुड़े खर्च पर भी प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, UPI पर MDR लागू होने के बाद लोग बड़े पैमाने पर कैश की ओर लौटेंगे, यह अभी स्थापित तथ्य नहीं है। इसका वास्तविक असर भुगतान की लागत को व्यापारी, ग्राहक और पूरा भुगतान तंत्र किस तरह वहन करता है, इस पर निर्भर करेगा।
RBI के आंकड़ों में जनता के पास बढ़ी नकदी
भारतीय रिजर्व बैंक ने 25 सितंबर 2026 को मनी स्टॉक से जुड़े आंकड़े जारी किए। इसमें Currency with the Public के जरिए यह बताया जाता है कि बैंकों के पास मौजूद नकदी को हटाने के बाद जनता के पास कितनी मुद्रा मौजूद है। आसान भाषा में कहें तो यह लोगों और कारोबारियों के हाथ में मौजूद नकदी का आंकड़ा है।
RBI के आंकड़ों के मुताबिक 31 मार्च 2026 को Currency with the Public 40 लाख 65,488 करोड़ रुपये थी। 15 सितंबर 2026 तक यह बढ़कर 42 लाख 10,170 करोड़ रुपये हो गई। यानी करीब साढ़े पांच महीने में जनता के पास मौजूद नकदी में लगभग 1 लाख 45 हजार करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई। प्रतिशत के लिहाज से यह करीब 3.6 फीसदी की वृद्धि है।
अगर 15 सितंबर 2026 के आंकड़े की तुलना एक साल पहले से की जाए तो Currency with the Public में 13.6 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई। मूल्य के लिहाज से यह करीब 5 लाख 3 हजार करोड़ रुपये की वृद्धि है। यानी पिछले एक साल के दौरान देश में जनता के पास मौजूद नकदी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है।
UPI बढ़ा तो कैश क्यों नहीं घटा?
यहां सबसे अहम बात यह है कि UPI का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ जनता के पास मौजूद नकदी भी बढ़ रही है। Cash-to-GDP Ratio यानी अर्थव्यवस्था के आकार की तुलना में जनता के पास मौजूद नकदी का अनुपात भी इसी तस्वीर का एक संकेत देता है।
मार्च 2026 में Cash-to-GDP Ratio 12.1 फीसदी था, जबकि एक साल पहले यह 11.7 फीसदी था। यानी अर्थव्यवस्था के आकार के मुकाबले भी नकदी का अनुपात बढ़ा है।
इससे यह सवाल उठता है कि जब रोजमर्रा के छोटे-बड़े भुगतानों में UPI की हिस्सेदारी बढ़ रही है, तब नकदी रखने की जरूरत और नकदी की मात्रा क्यों बढ़ रही है। हालांकि, केवल इन आंकड़ों के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि लोग UPI छोड़कर कैश की ओर लौट रहे हैं। नकदी और डिजिटल भुगतान एक साथ बढ़ सकते हैं और इसके पीछे अलग-अलग आर्थिक एवं व्यवहारिक कारण हो सकते हैं।
MDR लागू होने के बाद क्या बदल सकता है?
अब इसी तस्वीर को UPI पर MDR से जोड़कर देखा जा रहा है। अगर 2,000 रुपये से अधिक के कुछ मर्चेंट UPI भुगतानों पर भुगतान स्वीकार करने की लागत बढ़ती है, तो व्यापारियों के सामने उस लागत को वहन करने, कीमतों में उसका असर शामिल करने या ग्राहकों को दूसरे भुगतान माध्यमों की ओर भेजने जैसे विकल्प हो सकते हैं।
कुछ मामलों में ग्राहकों को कैश से भुगतान करने के लिए कहा जा सकता है। बड़े व्यापारियों या पेट्रोल पंप जैसे कारोबारों में भी भुगतान के तरीके को लेकर बदलाव देखने को मिल सकता है। हालांकि, यह अभी संभावित स्थिति है। इसका वास्तविक आकलन 15 अक्टूबर के बाद भुगतान व्यवहार में आने वाले बदलावों को देखकर ही किया जा सकेगा।
UPI के मुकाबले कैश की लागत कितनी?
इस बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू नकदी से जुड़ी लागत भी है। अगर 1 लाख रुपये के लेनदेन को आधार बनाया जाए तो UPI पर 1 लाख रुपये के लेनदेन की अनुमानित परिचालन लागत करीब 66 रुपये बैठती है।
वहीं, अगर 1 लाख रुपये को 500 रुपये के नोटों के रूप में छापा जाए तो RBI के उपलब्ध आंकड़ों में 500 रुपये के एक नोट की छपाई लागत करीब 0.96 रुपये बताई गई है। इस आधार पर 1 लाख रुपये के नोट छापने की लागत करीब 192 रुपये बैठती है।
हालांकि, यह केवल नोटों की छपाई का खर्च है। इसके अलावा नकदी के परिवहन, सुरक्षा, रखरखाव, छंटाई, नकदी प्रबंधन और एटीएम जैसी व्यवस्थाओं पर होने वाला खर्च भी जुड़ता है। ऐसे में नकदी आधारित भुगतान व्यवस्था की कुल लागत केवल नोट छापने की लागत तक सीमित नहीं रहती।
क्या बढ़ सकता है सरकार का खर्च?
UPI डिजिटल भुगतान का बड़ा माध्यम बन चुका है, लेकिन इसके साथ जनता के पास मौजूद नकदी में भी वृद्धि दर्ज हो रही है। अगर MDR के बाद भुगतान व्यवहार में बदलाव आता है और नकदी की मांग और बढ़ती है, तो इसका असर Currency in Circulation और नकदी प्रबंधन की पूरी व्यवस्था पर पड़ सकता है।
नकदी की मांग बढ़ने की स्थिति में नए नोटों की जरूरत बढ़ सकती है। इसके साथ नोटों की छपाई और नकदी को परिवहन एवं सुरक्षित रखने से जुड़े खर्च भी बढ़ सकते हैं।
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि UPI पर भुगतान लागत बढ़ने के बाद ग्राहक और व्यापारी किस स्तर पर अपने भुगतान व्यवहार में बदलाव करेंगे। 15 अक्टूबर के बाद के आंकड़े यह समझने में मदद करेंगे कि क्या डिजिटल भुगतान की लागत में बदलाव का असर नकदी की मांग पर पड़ता है और क्या इसका प्रभाव Currency in Circulation तथा नोटों से जुड़ी पूरी व्यवस्था में दिखाई देता है।
Navyug Samachar