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हजार साल पुराना बृहदेश्वर मंदिर: शिखर आज भी इंजीनियरों को कर देता है हैरान, परछाई को लेकर आज भी बना है रहस्य

धर्म डेस्क: तमिलनाडु के तंजावुर में स्थित बृहदेश्वर मंदिर भारतीय वास्तुकला और इंजीनियरिंग का ऐसा अद्भुत उदाहरण है, जिसने हजार साल बाद भी दुनिया को चकित कर रखा है। भगवान शिव को समर्पित यह भव्य मंदिर 11वीं शताब्दी में चोल सम्राट राजराजा चोल प्रथम द्वारा बनवाया गया था। यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल यह मंदिर दक्षिण भारत की स्थापत्य कला की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है।

चोल काल की इंजीनियरिंग का अद्भुत उदाहरण

इतिहासकार के. ए. नीलकंठ शास्त्री की प्रसिद्ध पुस्तक ‘द चोलाज’ में इस मंदिर के निर्माण और चोल काल की इंजीनियरिंग क्षमता का विस्तार से वर्णन मिलता है। विशेषज्ञों के अनुसार, उस समय उपलब्ध तकनीक के बावजूद जिस तरह इस मंदिर का निर्माण किया गया, वह आज भी एक इंजीनियरिंग चमत्कार माना जाता है।

बिना आधुनिक तकनीक के खड़ी हुई विशाल संरचना

मंदिर की सबसे खास बात इसकी मजबूत और सटीक संरचना है। माना जाता है कि इसमें पारंपरिक गहरी नींव का उपयोग नहीं किया गया। विशाल पत्थरों को बेहद सटीक तरीके से तराशकर एक-दूसरे से इंटरलॉक किया गया, जिससे उन्हें जोड़ने के लिए सीमेंट या आधुनिक गारे की जरूरत नहीं पड़ी।

इसी तकनीक के कारण यह मंदिर सदियों से भूकंप और प्राकृतिक परिस्थितियों को झेलते हुए आज भी मजबूती से खड़ा है।

216 फीट ऊंचा शिखर और 80 टन का रहस्यमयी पत्थर

मंदिर का 216 फीट ऊंचा शिखर इसकी सबसे आकर्षक विशेषताओं में से एक है। इसके शीर्ष पर रखा गया लगभग 80 टन वजनी ग्रेनाइट पत्थर आज भी लोगों के लिए रहस्य बना हुआ है।

उस दौर में भारी मशीनों या क्रेन के बिना इतने विशाल पत्थर को इतनी ऊंचाई तक पहुंचाना एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। इतिहासकारों के अनुसार, इसके लिए कई किलोमीटर लंबा ढलान बनाया गया था, जिसके सहारे हाथियों और श्रमिकों की मदद से पत्थर को ऊपर तक ले जाया गया।

परछाई को लेकर रहस्य और वैज्ञानिक व्याख्या

बृहदेश्वर मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित बात इसकी परछाई को लेकर है। आम धारणा है कि इस मंदिर के शिखर की परछाई जमीन पर नहीं पड़ती। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि बेहतरीन वास्तुकला और ज्यामिति का परिणाम है।

मंदिर की बनावट, ऊंचाई और सूर्य के कोण को इस तरह डिजाइन किया गया है कि दिन के विशेष समय में इसकी परछाई मंदिर परिसर के भीतर ही सीमित रहती है, जिससे यह भ्रम उत्पन्न होता है कि परछाई जमीन पर नहीं पड़ती।

दूर-दराज से लाए गए लाखों टन पत्थर

मंदिर के निर्माण में लगभग 1.30 लाख टन ग्रेनाइट पत्थरों के उपयोग का उल्लेख मिलता है। दिलचस्प बात यह है कि तंजावुर क्षेत्र में इस मात्रा में ग्रेनाइट उपलब्ध नहीं था, इसलिए इन्हें दूर-दराज के क्षेत्रों से लाकर मंदिर का निर्माण किया गया।

यह तथ्य चोल साम्राज्य की संगठन क्षमता, संसाधन प्रबंधन और तकनीकी दक्षता को दर्शाता है।

आज भी शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र

आज बृहदेश्वर मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन वैज्ञानिक सोच, इंजीनियरिंग कौशल और वास्तुकला का जीवंत प्रमाण माना जाता है। हजार वर्षों बाद भी इसकी भव्यता और रहस्य दुनियाभर के पर्यटकों, इतिहासकारों और शोधकर्ताओं को आकर्षित करते हैं।

 

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