नेशनल डेस्क : देशभर के करोड़ों पैदल यात्रियों के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि फुटपाथ पर सुरक्षित तरीके से चलने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। अदालत ने कहा कि नागरिकों को सुरक्षित, बाधारहित और दिव्यांगजन-अनुकूल फुटपाथ उपलब्ध कराना सरकारों की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने सड़क सुरक्षा से जुड़ी एक याचिका की सुनवाई के दौरान की। याचिका में अदालत का ध्यान इस तथ्य की ओर दिलाया गया था कि देश के कई शहरों में या तो फुटपाथ मौजूद नहीं हैं या फिर अतिक्रमण, अवैध पार्किंग और अन्य अवरोधों के कारण उनका उपयोग करना बेहद कठिन हो गया है। ऐसी स्थिति में लोगों को मजबूरी में सड़क पर चलना पड़ता है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।
पैदल चलने के अधिकार को बताया मौलिक अधिकार
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने कहा कि पैदल चलने का अधिकार संविधान के भाग-3 के तहत संरक्षित एक मौलिक अधिकार है। अदालत के अनुसार यह अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत प्रदत्त आवागमन की स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है और इसे अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(b), 19(1)(c) तथा अनुच्छेद 21 के साथ पढ़ा जाना चाहिए।
पीठ ने कहा कि पैदल यात्रियों के इस अधिकार में स्पष्ट रूप से चिन्हित और सुरक्षित फुटपाथों का अधिकार भी शामिल है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ये अधिकार प्राथमिक हैं और इन्हें मोटर चालित वाहनों की आवाजाही की तुलना में वरीयता मिलनी चाहिए।
‘पहियों ने हमारी सोच पर कब्जा कर लिया है’
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने शहरी विकास की वर्तमान सोच पर भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यह आश्चर्यजनक है कि पैदल चलने के अधिकार को पहचानने और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। न्यायालय ने कहा कि संभवतः इसकी वजह यह है कि पहियों ने हमारी सोच पर कब्जा कर लिया है और नगर निकाय लंबे समय तक ऐसी सड़कें बनाने में व्यस्त रहे जो मुख्य रूप से मोटर वाहनों के लिए अधिक अनुकूल हों।
दिव्यांगजनों के लिए विशेष सुविधाओं पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में दिव्यांगजनों के अधिकारों को भी विशेष महत्व दिया। अदालत ने कहा कि फुटपाथों का निर्माण इस प्रकार होना चाहिए कि व्हीलचेयर या अन्य सहायक उपकरणों का उपयोग करने वाले लोग भी उनका आसानी से इस्तेमाल कर सकें। न्यायालय ने कहा कि सार्वजनिक बुनियादी ढांचे में समावेशिता सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश
अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि वे फुटपाथों की उपलब्धता, रखरखाव और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार करें। साथ ही फुटपाथों पर होने वाले अतिक्रमण को हटाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
पीठ ने कहा कि यदि सुरक्षित और पर्याप्त फुटपाथ उपलब्ध नहीं होंगे तो पैदल यात्रियों को सड़क का उपयोग करना पड़ेगा, जो उनकी सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। इसलिए सुरक्षित फुटवे और फुटपाथ उपलब्ध कराना केवल प्रशासनिक व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि एक संवैधानिक दायित्व है।
Navyug Samachar