नेशनल डेस्क : जम्मू-कश्मीर के डोडा जिले की ऊंची पहाड़ियों के बीच बसा धदकई गांव अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के साथ एक ऐसी अनोखी पहचान भी रखता है, जिसने वर्षों से वैज्ञानिकों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इस गांव को ‘साइलेंट विलेज’ के नाम से जाना जाता है, क्योंकि यहां रहने वाले लोगों का एक बड़ा वर्ग जन्म से ही सुनने और बोलने में असमर्थ है।
करीब दो हजार की आबादी में 90 से अधिक मूक-बधिर
धदकई गांव की कुल आबादी लगभग दो हजार के आसपास बताई जाती है। इनमें 90 से ज्यादा लोग ऐसे हैं जो जन्म से ही मूक-बधिर हैं। किसी सामान्य ग्रामीण क्षेत्र की तुलना में यह संख्या काफी अधिक मानी जाती है। खास बात यह है कि गांव के कई परिवारों में एक से अधिक सदस्य इस स्थिति से प्रभावित पाए गए हैं।
संकेत भाषा बनी गांव की पहचान
गांव में संवाद का तरीका भी बेहद अलग है। यहां मूक-बधिर लोग आपस में बातचीत के लिए विशेष सांकेतिक भाषा का उपयोग करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि जो लोग सामान्य रूप से सुन और बोल सकते हैं, वे भी इस स्थानीय संकेत भाषा को समझते और इस्तेमाल करते हैं। यही वजह है कि गांव का सामाजिक और पारिवारिक जीवन एक अलग व्यवस्था के तहत सुचारु रूप से चलता है।
कई पीढ़ियों से चली आ रही है यह स्थिति
स्थानीय लोगों के अनुसार यह समस्या कोई नई नहीं है, बल्कि कई पीढ़ियों से गांव का हिस्सा रही है। शुरुआती मामलों का उल्लेख 20वीं सदी की शुरुआत में मिलता है। इसके बाद समय के साथ ऐसे मामलों की संख्या बढ़ती गई और धीरे-धीरे यह गांव अपनी इसी विशेष पहचान के कारण चर्चा का विषय बन गया।
वैज्ञानिक जांच में सामने आया आनुवंशिक कारण
लंबे समय तक इस स्थिति को लेकर कई तरह की धारणाएं और अटकलें लगाई जाती रहीं। कुछ लोग इसे प्राकृतिक कारणों से जोड़ते थे तो कुछ अंधविश्वासों से। हालांकि बाद में हुए वैज्ञानिक अध्ययनों ने इसके पीछे का वास्तविक कारण उजागर किया।
शोधकर्ताओं के अनुसार यह स्थिति ‘जेनेटिक क्लस्टर’ और ‘फाउंडर्स इफेक्ट’ से जुड़ी हुई है। जब सीमित आबादी वाले समुदायों में लंबे समय तक आपस में ही विवाह होते रहते हैं, तो कुछ आनुवंशिक दोष पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ते जाते हैं और उनकी संभावना बढ़ जाती है।
OTOF जीन की गड़बड़ी बनी मुख्य वजह
वैज्ञानिकों ने अध्ययन के दौरान पाया कि प्रभावित लोगों में OTOF नामक जीन में बदलाव मौजूद है। यह जीन कानों से दिमाग तक ध्वनि संकेत पहुंचाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि माता और पिता दोनों की ओर से यह प्रभावित जीन बच्चे तक पहुंचता है, तो जन्म से ही सुनने और बोलने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
जागरूकता और जेनेटिक परीक्षण पर विशेषज्ञों का जोर
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या को कम करने के लिए सामाजिक जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है। विवाह संबंधों में विविधता लाने, समय पर जेनेटिक परीक्षण कराने और लोगों को आनुवंशिक जोखिमों के प्रति जागरूक करने से भविष्य में इस तरह के मामलों को कम किया जा सकता है।
मुख्यधारा से जोड़ने के लिए जारी हैं प्रयास
पिछले कुछ वर्षों में कई सामाजिक संस्थाएं और संगठन धदकई गांव के लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में काम कर रहे हैं। साइन लैंग्वेज प्रशिक्षण, शिक्षा और संवाद कौशल विकसित करने जैसे प्रयासों के जरिए यहां के लोगों के जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश की जा रही है। इन पहलों से गांव में सकारात्मक बदलाव की उम्मीद भी बढ़ी है।
Navyug Samachar