Monday , 5 October 2026

पत्नी की कमाई पति से ज्यादा तो क्यों मिले गुजारा भत्ता? हाई कोर्ट ने ₹20 हजार मासिक भरण-पोषण का आदेश किया रद्द

नेशनल डेस्क : गुजारा भत्ता से जुड़े एक अहम मामले में कर्नाटक हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल महिला होने के आधार पर किसी पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार नहीं दिया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि पत्नी आर्थिक रूप से सक्षम है और अपनी जरूरतों का खर्च स्वयं उठा सकती है, तो गुजारा भत्ता को स्वतः मिलने वाला अधिकार नहीं माना जा सकता।

हाई कोर्ट ने एक मामले में निचली अदालत द्वारा पति को अलग रह रही पत्नी को हर महीने 20 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य जरूरतमंद जीवनसाथी को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है, न कि इसे एक अनिवार्य अधिकार के रूप में लागू करना।

आर्थिक रूप से सक्षम पत्नी को स्वतः नहीं मिलेगा भरण-पोषण

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति चिल्लकुर सुमलता ने कहा कि फैमिली कोर्ट को पारंपरिक सोच से ऊपर उठकर तथ्यों के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। यदि पत्नी की आय पति से अधिक है और उसके ऊपर बच्चों की देखभाल जैसी अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी नहीं हैं, तो केवल इस आधार पर पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश नहीं दिया जाना चाहिए कि वह पत्नी का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य है।

अदालत ने कहा कि किसी महिला को गुजारा भत्ता तभी दिया जाना चाहिए जब यह साबित हो जाए कि उसके पास अपने जीवन-निर्वाह और वैवाहिक जीवन स्तर के अनुरूप जीवन जीने के लिए पर्याप्त आय का स्रोत नहीं है।

फैमिली कोर्ट को दी महत्वपूर्ण नसीहत

हाई कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण संबंधी मामलों में जेंडर आधारित पूर्वाग्रह से बचना जरूरी है। अदालतों को प्रत्येक मामले की वास्तविक आर्थिक परिस्थितियों का आकलन करना चाहिए और यह देखना चाहिए कि संबंधित पक्ष की आय, जिम्मेदारियां और वित्तीय स्थिति क्या है।

न्यायालय ने कहा कि केवल पत्नी होने के कारण किसी महिला को गुजारा भत्ता देने का दृष्टिकोण न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

पति ने हाई कोर्ट में दी थी चुनौती

मामले में पति ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए कहा था कि उसकी मासिक आय करीब 60 हजार रुपये है, जबकि उसकी पत्नी हर महीने एक लाख रुपये से अधिक कमाती है। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट ने उसकी आर्थिक स्थिति पर पर्याप्त विचार किए बिना उसे 20 हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने का आदेश दे दिया।

हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि निचली अदालत ने पत्नी की आय और वित्तीय स्थिति को उचित महत्व नहीं दिया था। इसी आधार पर अदालत ने अंतरिम भरण-पोषण संबंधी आदेश को रद्द कर दिया।

भरण-पोषण का आधार होगी वास्तविक जरूरत

अदालत ने अपने आदेश में दोहराया कि गुजारा भत्ता का उद्देश्य आर्थिक रूप से निर्भर जीवनसाथी को सहायता देना है। इसलिए ऐसे मामलों में दोनों पक्षों की आय, जीवन स्तर, जिम्मेदारियां और वास्तविक जरूरतों का समुचित मूल्यांकन किया जाना आवश्यक है।

यह फैसला भविष्य में भरण-पोषण से जुड़े मामलों में आर्थिक क्षमता और वास्तविक जरूरतों को महत्व देने वाले महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जा रहा है।

 

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