
नेशनल डेस्क: 20 जुलाई से शुरू होने वाले संसद के मॉनसून सत्र से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की राजनीतिक स्थिति पहले के मुकाबले अधिक मजबूत मानी जा रही है। ऐसे में इस बात पर नजर रहेगी कि सरकार किन महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन विधेयकों को आगे बढ़ाने की कोशिश करती है। हालांकि, संविधान संशोधन के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, इसलिए संख्या बल अब भी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।
संविधान संशोधन के लिए अब भी जरूरी है दो-तिहाई बहुमत
पिछले संसदीय सत्र में सरकार को 131वें संविधान संशोधन विधेयक पर आवश्यक समर्थन नहीं मिल सका था। संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत के मुकाबले सरकार निर्धारित संख्या से पीछे रह गई थी। मौजूदा राजनीतिक समीकरणों में एनडीए की स्थिति पहले से मजबूत हुई है, लेकिन पूर्ण बहुमत के आंकड़े तक पहुंचना अब भी चुनौती माना जा रहा है। राज्यसभा में भी सरकार को आवश्यक संख्या जुटानी होगी।
पीएम और सीएम के पद से जुड़े प्रस्ताव पर रह सकती है नजर
मॉनसून सत्र में उन विधेयकों में से एक पर चर्चा की संभावना जताई जा रही है, जिसे पहले संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा गया था। प्रस्तावित प्रावधान के अनुसार, यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई राज्य मंत्री ऐसे आपराधिक मामले में, जिसमें पांच वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो, 30 दिनों तक जेल में रहता है, तो उसके पद से संबंधित प्रावधान लागू हो सकते हैं। यह विधेयक पहले व्यापक बहस के बाद संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया था।
‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ पर भी टिकी रहेंगी निगाहें
सरकार के प्रमुख एजेंडों में शामिल ‘वन नेशन, वन इलेक्शन’ से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक पर भी मॉनसून सत्र के दौरान गतिविधि तेज हो सकती है। यह प्रस्ताव फिलहाल संसदीय समिति के विचाराधीन है। सरकार का तर्क है कि बार-बार होने वाले चुनावों से विकास कार्य प्रभावित होते हैं, जबकि विपक्ष इस प्रस्ताव को लेकर लगातार सवाल उठाता रहा है।
महिला आरक्षण और परिसीमन का मुद्दा फिर बन सकता है केंद्र
महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों पर भी इस सत्र में चर्चा होने की संभावना बनी हुई है। सरकार का पक्ष है कि महिला आरक्षण के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए परिसीमन की प्रक्रिया आवश्यक है। वहीं विपक्ष का कहना है कि वर्तमान सीटों पर भी महिला आरक्षण लागू किया जा सकता है और परिसीमन को इससे जोड़ना उचित नहीं है।
दक्षिणी राज्यों की चिंताएं भी बनी हुई हैं
परिसीमन को लेकर दक्षिण भारत के कई राज्यों ने अपनी आशंकाएं पहले भी जताई हैं। उनका तर्क है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्निर्धारण से कुछ राज्यों के प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, सरकार सभी पक्षों को विश्वास में लेकर आगे बढ़ने की बात कहती रही है।
मॉनसून सत्र में इन प्रस्तावित संवैधानिक संशोधनों को लेकर सरकार की रणनीति, विपक्ष का रुख और संसद में संख्या बल की स्थिति पर सभी की नजर रहेगी।
Navyug Samachar