Monday , 5 October 2026

Form 6 में बदलाव किसने किया? सुप्रीम कोर्ट ने मांगा पूरा रिकॉर्ड, CJI सूर्यकांत बोले- ‘देखना चाहते हैं किसने बदला’

नेशनल डेस्क: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ऑनलाइन Form 6 में किए गए कथित बदलाव पर चुनाव आयोग से पूरा रिकॉर्ड पेश करने को कहा है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने साफ किया कि संशोधित Form 6 को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी नहीं मिली थी। अदालत अब रिकॉर्ड के जरिए यह पता लगाना चाहती है कि ऑनलाइन फॉर्म में अतिरिक्त घोषणा किसके निर्देश पर और किस प्रक्रिया के तहत जोड़ी गई।

Form 6 में आखिर क्या बदला गया था?

Form 6 वह वैधानिक आवेदन है, जिसके जरिए पात्र नागरिक मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन करता है। विवाद उस अतिरिक्त घोषणा को लेकर है, जिसे एसआईआर के दौरान ऑनलाइन Form 6 में जोड़ा गया था। इसमें आवेदक से यह बताने को कहा गया था कि उसका नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली एसआईआर के दौरान तैयार मतदाता सूची में दर्ज था या नहीं।

रिपोर्ट के मुताबिक, ऑनलाइन फॉर्म में तीन विकल्प दिए गए थे। इनमें आवेदक का नाम पिछली एसआईआर सूची में होना, माता-पिता या दादा-दादी का नाम होना अथवा इनमें से किसी का नाम नहीं होना शामिल था। हालांकि इस हिस्से को औपचारिक तौर पर अनिवार्य नहीं बताया गया था, लेकिन कथित तौर पर इसका जवाब दिए बिना ऑनलाइन आवेदन आगे नहीं बढ़ पा रहा था।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सोमवार की सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि किसी भी संशोधित Form 6 को अदालत की मंजूरी नहीं मिली है। उन्होंने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड सामने आने के बाद अदालत यह देखना चाहती है कि आखिर फॉर्म में बदलाव किसने किया।

सुनवाई सीजेआई सूर्यकांत के साथ जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने की। अदालत के सामने अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की याचिका थी। इसमें ईसीआईनेट और ईरोनेट पोर्टल पर Form 6 के ऑनलाइन संस्करण में एसआईआर से जुड़ी अतिरिक्त शर्तें जोड़े जाने को चुनौती दी गई है।

क्या चुनाव आयोग Form 6 में बदलाव कर सकता है?

विवाद का एक अहम कानूनी पहलू यह है कि Form 6 का संबंध Registration of Electors Rules, 1960 से है। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कथित तौर पर इस बदलाव पर आपत्ति जताई थी।

उनका तर्क था कि वैधानिक नियमों में निर्धारित फॉर्म में केवल ऑनलाइन पोर्टल में तकनीकी बदलाव करके परिवर्तन नहीं किया जा सकता। इसके लिए तय कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने मई में इस बात पर सवाल उठाए थे कि 1960 के नियमों में संशोधन किए बिना वैधानिक फॉर्म बदला जा सकता है या नहीं।

चुनाव आयोग ने क्या सफाई दी?

चुनाव आयोग का रुख इस मामले में अलग है। आयोग का कहना है कि वैधानिक Form 6 में कोई बदलाव नहीं किया गया। उसके मुताबिक, एसआईआर की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऑनलाइन प्रक्रिया में अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी और इसका इस्तेमाल एसआईआर से जुड़ी प्रक्रिया के दौरान किया जाना था।

आयोग ने 26 सितंबर को स्पष्ट किया था कि एसआईआर के दौरान अतिरिक्त घोषणा लागू रहेगी, जबकि सामान्य परिस्थितियों में Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित वैधानिक फॉर्म का इस्तेमाल किया जाएगा। बाद में जिन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में एसआईआर पूरा हो चुका है, वहां ऑनलाइन Form 6 से यह अतिरिक्त घोषणा हटा दी गई।

दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति से बढ़ा विवाद

Form 6 का विवाद उस समय और गहरा गया जब चुनाव आयोग के भीतर ही इस मुद्दे पर मतभेद सामने आने की रिपोर्ट आई। द इंडियन एक्सप्रेस की जांच के अनुसार, नवंबर 2025 से सितंबर 2026 के बीच चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर कम से कम 14 मौकों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज की थीं।

इनमें मतदाता सूची, एसआईआर, नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता डेटा और ईसीआईनेट जैसे तकनीकी तंत्र से जुड़े मुद्दे शामिल थे। वहीं आयोग ने इन टिप्पणियों को नियमित विचार-विमर्श का हिस्सा बताते हुए कहा था कि महत्वपूर्ण फैसलों को पूरे आयोग की मंजूरी हासिल थी।

सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता ने क्या उठाया मुद्दा?

सोमवार को शैलेंद्र मणि त्रिपाठी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने Form 6 में कथित बदलाव और एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों का उल्लेख किया। उन्होंने दिल्ली में एसआईआर की प्रक्रिया और इससे प्रभावित बड़ी संख्या में मतदाताओं का मुद्दा भी अदालत के सामने रखा।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने याचिका में मांगी गई राहतों को लेकर कहा कि प्रार्थनाएं कुछ हद तक आपस में मिली हुई हैं और वकील को इन्हें दोबारा देखने को कहा। इसके बाद याचिका को सामाजिक कार्यकर्ता राकेश कुमार सिंह की उस याचिका के साथ जोड़ने पर सहमति बनी, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा कथित तौर पर एकतरफा तरीके से लिए गए फैसलों को चुनौती दी गई है।

CEC ज्ञानेश कुमार से जुड़े मामले पर भी नोटिस

राकेश कुमार सिंह की याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग जैसे बहुसदस्यीय संवैधानिक निकाय की शक्तियों का इस्तेमाल कुछ मामलों में सामूहिक निर्णय के बजाय कथित तौर पर एकतरफा तरीके से किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में चुनाव आयोग, केंद्र सरकार, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों अन्य चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया है। हालांकि, मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल निलंबित करने की मांग पर अदालत ने कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया। कोर्ट ने कहा कि पहले संबंधित पक्षों का जवाब लेना जरूरी है।

सीजेआई सूर्यकांत ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत केवल किसी मीडिया रिपोर्ट के आधार पर आदेश नहीं दे सकती। अदालत पहले चुनाव आयोग का जवाब और संबंधित रिकॉर्ड देखना चाहती है। अगर आयोग का कोई फैसला कानून के अनुरूप नहीं पाया जाता है तो उसे निरस्त किया जा सकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल- Form 6 बदला किसने?

इस पूरे विवाद का सबसे अहम सवाल अब यही है कि ऑनलाइन Form 6 में एसआईआर से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा किस स्तर पर और किस अधिकारी या प्राधिकरण के निर्देश पर जोड़ी गई। इसके साथ यह भी जांच का विषय है कि ऐसा करने के लिए किस कानूनी आधार और प्रक्रिया का इस्तेमाल किया गया।

सुप्रीम कोर्ट की सोमवार की टिप्पणी से साफ है कि अदालत रिकॉर्ड के आधार पर इस पूरी प्रक्रिया की तह तक जाना चाहती है। हालांकि अभी अदालत ने यह निष्कर्ष नहीं दिया है कि Form 6 में किया गया बदलाव गैरकानूनी था या इसके लिए कौन जिम्मेदार है।

SIR के दौरान Form 6 क्यों हुआ अहम?

इस विवाद का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में मतदाता रिकॉर्ड की दोबारा जांच की गई। रिपोर्ट के मुताबिक, 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में प्रारूप मतदाता सूची से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए थे। आयोग ने बाद में एसआईआर से छूटे पात्र मतदाताओं और पहली बार पात्र हुए युवाओं को जोड़ने के लिए विशेष अभियान भी शुरू किया।

ऐसे में Form 6 के जरिए नए मतदाता के तौर पर पंजीकरण या दोबारा नाम जुड़वाने की प्रक्रिया सीधे मतदाता सूची में शामिल होने के अधिकार से जुड़ जाती है। खासतौर पर उन युवाओं के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण है, जिनका जन्म पिछली एसआईआर के बाद हुआ है और जिनका नाम पुरानी एसआईआर सूची में होना संभव नहीं है।

अब आगे क्या होगा?

अब सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग और केंद्र का जवाब तथा संबंधित रिकॉर्ड देखेगा। इसके बाद अदालत यह जांच सकती है कि Form 6 में अतिरिक्त घोषणा जोड़ने का फैसला किस स्तर पर लिया गया, क्या इसके लिए जरूरी वैधानिक प्रक्रिया का पालन हुआ और क्या यह फैसला आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के अनुरूप था।

फिलहाल अदालत ने इतना स्पष्ट कर दिया है कि संशोधित Form 6 को उसकी मंजूरी नहीं मिली थी। अब रिकॉर्ड सामने आने के बाद यह सवाल अहम होगा कि ऑनलाइन फॉर्म में बदलाव आखिर किसने किया और उसे ऐसा करने का अधिकार किस आधार पर मिला।

 

Check Also

जनता दर्शन में CM योगी का बड़ा फरमान, बोले- पीड़ित दोबारा आया तो अफसर होंगे जिम्मेदार, कब्जेदारों पर होगी कड़ी कार्रवाई

यूपी डेस्क: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सोमवार सुबह गोरखपुर में आयोजित जनता दर्शन में दूरदराज …