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श्मशान घाट नदियों के किनारे ही क्यों होते हैं? सदियों पुरानी परंपरा के पीछे धर्म ही नहीं, ये वजहें भी हैं

नई दिल्ली: हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक जल को विशेष महत्व दिया गया है। धार्मिक परंपराओं में नदियों को सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, बल्कि पवित्रता और जीवन का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि भारत के कई प्रमुख पुराने श्मशान घाट नदियों के किनारे बसे हुए हैं। वाराणसी का मणिकर्णिका घाट, हरिद्वार के घाट और प्रयागराज का संगम क्षेत्र इसके प्रमुख उदाहरण हैं। आज भी इन जगहों पर अंतिम संस्कार से जुड़ी परंपराएं निभाई जाती हैं।

नदी किनारे श्मशान घाट होने के पीछे सिर्फ आस्था नहीं

श्मशान घाटों का नदियों के पास होना केवल धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा विषय नहीं है। इसके पीछे पुराने समय की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियां भी अहम रही हैं। प्राचीन भारत में ज्यादातर नगर और बस्तियां नदियों के आसपास ही विकसित होती थीं। नदियां पीने के पानी, खेती, आवागमन और रोजमर्रा के जीवन के लिए बेहद जरूरी थीं। नदी किनारे खुले स्थान भी अपेक्षाकृत आसानी से मिल जाते थे। ऐसे में अंतिम संस्कार के लिए नदी के किनारे जगह चुनना व्यावहारिक भी था। समय के साथ इन्हीं स्थानों पर घाट विकसित हुए और वे धार्मिक व सामाजिक जीवन का हिस्सा बन गए।

पंचतत्व में विलीन होने की मान्यता

हिंदू दर्शन के अनुसार मानव शरीर पंचतत्वों से बना है। ये पंचतत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हैं। धार्मिक मान्यता है कि मृत्यु के बाद शरीर इन्हीं तत्वों में वापस विलीन हो जाता है। दाह संस्कार में अग्नि को शरीर के स्थूल रूप को प्रकृति में लौटाने का माध्यम माना जाता है। इसके बाद बची राख और अस्थियों को जल में विसर्जित करने की परंपरा भी लंबे समय से चली आ रही है। इसे शरीर के प्रकृति के चक्र में वापस लौटने के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है।

जल को हिंदू परंपरा में शुद्धि और पवित्रता से भी जोड़ा गया है। यही कारण है कि अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में कई स्तरों पर जल का इस्तेमाल होता है। दाह संस्कार के बाद अस्थियों और राख को जल में प्रवाहित करने की परंपरा आज भी कई परिवारों में निभाई जाती है। धार्मिक दृष्टि से इसे दिवंगत व्यक्ति के प्रति अंतिम कर्तव्य माना जाता है। वहीं वैज्ञानिक दृष्टि से दाह संस्कार के बाद बचे अवशेषों में अलग-अलग खनिज तत्व होते हैं, जिनमें कुछ पानी में घुल सकते हैं, जबकि कुछ तलछट का हिस्सा बन सकते हैं।

अंतिम संस्कार के बाद की रस्मों में भी नदी उपयोगी

पुराने समय में नदी किनारे श्मशान होने का एक और व्यावहारिक फायदा था। अंतिम संस्कार के बाद जरूरी धार्मिक क्रियाएं उसी क्षेत्र में पूरी की जा सकती थीं। नदी तक पहुंच आसान होने के कारण अस्थि विसर्जन जैसी परंपराओं को पूरा करना भी सुविधाजनक था। इतिहास से जुड़े शोध भी बताते हैं कि भारत में पारंपरिक दाह संस्कार स्थल अक्सर नदी या समुद्र के करीब बनाए जाते थे, ताकि राख और अस्थियों को जल में विसर्जित किया जा सके।

समय के साथ शहरों का विस्तार हुआ और आबादी तेजी से बढ़ी। कई जगह पुराने नदी किनारे बने श्मशान घाट शहरों के बीच आ गए, जबकि नई जगहों पर आबादी से दूर श्मशान घाट बनाए जाने लगे। इसके बावजूद नदियों और श्मशान घाटों का यह संबंध आज भी हिंदू संस्कृति में गहराई से दिखाई देता है। इसलिए श्मशान घाटों का नदियों के किनारे होना किसी एक धार्मिक रहस्य का परिणाम नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा, भूगोल और प्राचीन जीवन व्यवस्था के लंबे मेल का परिणाम माना जा सकता है।

 

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