
नेशनल डेस्क: पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान को वर्ष 2020 के प्रदर्शन से जुड़े आपराधिक मामले में सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है। सर्वोच्च अदालत ने मामले को दोबारा शुरू करने को लेकर अनिच्छा जताते हुए कहा कि वर्तमान में भगवंत मान एक संवैधानिक और जिम्मेदार पद पर हैं तथा अदालत इस मामले को फिर से खोलने के पक्ष में नहीं है। हालांकि, मामले में प्रस्तुत किए जाने वाले साक्ष्यों पर सुनवाई के लिए अदालत ने 20 जुलाई की तारीख निर्धारित की है।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे, पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें भगवंत मान के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमे को रद्द कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि राजनीति में नारेबाजी आम बात है और अदालत इस मामले को दोबारा शुरू करने के पक्ष में नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि इस घटना में किसी को गंभीर चोट नहीं आई थी और मौजूदा परिस्थितियों में मामले को फिर से शुरू करने का कोई ठोस कारण दिखाई नहीं देता।
हालांकि, चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से पेश किए जाने वाले साक्ष्यों को देखते हुए अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई को तय की है।
चंडीगढ़ प्रशासन ने हाई कोर्ट के फैसले को दी है चुनौती
चंडीगढ़ प्रशासन ने वर्ष 2025 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट द्वारा पारित उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें भगवंत मान के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द कर दिया गया था।
सुनवाई के दौरान चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस. वी. राजू ने अदालत को बताया कि मुख्यमंत्री भगवंत मान के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं। उन्होंने यह भी दलील दी कि उच्च न्यायालय ने मामले में तथ्यों के गुण-दोष पर विचार करते हुए एक तरह से मिनी ट्रायल कर लिया।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला जनवरी 2020 का है, जब तत्कालीन पंजाब मुख्यमंत्री के आवास के बाहर बिजली दरों में वृद्धि समेत विभिन्न मुद्दों को लेकर आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और भगवंत मान ने प्रदर्शन किया था। प्रदर्शन के दौरान कुछ पुलिसकर्मियों को हल्की चोटें आई थीं, जिसके बाद आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज किया गया था।
हाई कोर्ट ने क्यों रद्द किया था मामला?
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने वर्ष 2025 में सुनवाई के दौरान भगवंत मान के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द कर दिया था। अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि पुलिसकर्मियों को आई चोटें गंभीर नहीं थीं। साथ ही घटना के दिन लगभग 750 से 800 कार्यकर्ता प्रदर्शन में शामिल थे।
उच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि भारतीय दंड संहिता की धारा 332 और 353 के तहत अपराध स्थापित करने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध नहीं है। अदालत ने यह भी उल्लेख किया था कि घटना के समय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 लागू नहीं थी, इसलिए प्रदर्शनकारियों को मुख्यमंत्री आवास की ओर बढ़ने से रोकने का कोई स्पष्ट आधार नहीं था।
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