
बिजनेस डेस्क: आयकर रिटर्न दाखिल करते समय टैक्स बचाने के लिए गलत जानकारी देना या फर्जी डिडक्शन का दावा करना अब भारी पड़ सकता है। टैक्स देनदारी कम करने के लिए गलत निवेश, नकली रसीदें या बढ़ा-चढ़ाकर खर्च दिखाने वाले टैक्सपेयर्स के खिलाफ आयकर विभाग सख्त कार्रवाई कर सकता है।
कई टैक्सपेयर्स टैक्स बचाने के लिए ऐसे खर्चों का दावा करने की कोशिश करते हैं, जो वास्तव में हुए ही नहीं हैं। इनमें फर्जी निवेश, मेडिकल खर्च, शिक्षा से जुड़े खर्च या नकली दस्तावेजों के जरिए डिडक्शन लेने जैसे मामले शामिल हो सकते हैं। आयकर कानूनों के तहत ऐसी गतिविधियों पर जुर्माने से लेकर कानूनी कार्रवाई तक का प्रावधान है।
डेटा के जरिए हो रही टैक्स रिटर्न की जांच
आयकर विभाग अब टैक्स रिटर्न की जांच के लिए डिजिटल डेटा और विभिन्न स्रोतों से मिली जानकारियों का इस्तेमाल कर रहा है। विभाग टैक्सपेयर्स द्वारा किए गए दावों का मिलान नियोक्ता, बैंक, वित्तीय संस्थानों, वार्षिक सूचना विवरण और फॉर्म 26एएस जैसे रिकॉर्ड से करता है।
अगर किसी टैक्सपेयर के रिटर्न में की गई जानकारी और उपलब्ध रिकॉर्ड में अंतर पाया जाता है, तो विभाग जांच शुरू कर सकता है और नियमों के अनुसार कार्रवाई की जा सकती है।
गलत एंट्री पर लग सकता है भारी जुर्माना
आयकर कानून की धारा 271एएडी के तहत अगर जांच के दौरान यह सामने आता है कि टैक्सपेयर ने खाते की किताबों में गलत एंट्री की है या टैक्स देनदारी कम करने के लिए जानबूझकर कोई जानकारी छिपाई है, तो उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है।
ऐसे मामलों में गलत या छिपाई गई एंट्री की रकम के बराबर यानी 100 प्रतिशत तक जुर्माने का प्रावधान है। इसका मतलब है कि फर्जी डिडक्शन के जरिए बचाया गया टैक्स बाद में बड़ी आर्थिक परेशानी का कारण बन सकता है।
अंडर-रिपोर्टिंग और मिस-रिपोर्टिंग में अंतर
आयकर कानून में आय की कम जानकारी देना और गलत जानकारी देना अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया है। धारा 270ए के तहत इन दोनों स्थितियों में अलग-अलग जुर्माने का प्रावधान है।
अंडर-रिपोर्टिंग उस स्थिति को कहा जाता है, जब टैक्सपेयर अपनी वास्तविक आय से कम आय दिखाता है। यह जानकारी छूटने, गलत गणना या गलत दावे की वजह से हो सकता है।
वहीं, मिस-रिपोर्टिंग में जानबूझकर तथ्यों को छिपाना, फर्जी खर्च दिखाना, गलत जानकारी देना या लेनदेन को रिकॉर्ड नहीं करना शामिल होता है।
गलत रिपोर्टिंग पर देना पड़ सकता है भारी जुर्माना
अंडर-रिपोर्टिंग के मामलों में संबंधित आय पर देय टैक्स का 50 प्रतिशत तक जुर्माना लगाया जा सकता है।
वहीं, मिस-रिपोर्टिंग यानी जानबूझकर गलत जानकारी देने के मामलों में देय टैक्स का 200 प्रतिशत तक जुर्माना लगाया जा सकता है। आयकर विभाग टैक्स चोरी रोकने के लिए इन प्रावधानों का इस्तेमाल करता है।
टैक्स चोरी साबित होने पर जेल का भी प्रावधान
अगर जांच में यह साबित होता है कि किसी टैक्सपेयर ने जानबूझकर फर्जी डिडक्शन या गलत दावों के जरिए टैक्स चोरी करने की कोशिश की है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू हो सकती है।
आयकर कानून की धारा 276सी के तहत जानबूझकर टैक्स चोरी की कोशिश करने पर तीन महीने से लेकर सात साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है। सजा की अवधि टैक्स चोरी की रकम और मामले की गंभीरता पर निर्भर करती है।
वहीं, धारा 277 के तहत गलत जानकारी देने या गलत दस्तावेज पेश करने के मामलों में भी जेल और जुर्माने की कार्रवाई हो सकती है। आमतौर पर गंभीर धोखाधड़ी, बार-बार नियम तोड़ने या फर्जी दस्तावेज तैयार करने वाले मामलों में कानूनी कार्रवाई की जाती है।
टैक्स रिटर्न भरते समय रखें सावधानी
विशेषज्ञों के अनुसार, टैक्स बचाने के लिए केवल उन्हीं डिडक्शन का दावा करना चाहिए जिनके लिए वैध दस्तावेज और प्रमाण उपलब्ध हों। गलत जानकारी देकर थोड़े समय के लिए टैक्स बचाने की कोशिश भविष्य में बड़े जुर्माने और कानूनी परेशानी का कारण बन सकती है।
Navyug Samachar