बिहार डेस्क : जीएसटी दिवस 2026 के मौके पर सामने आई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट ने बिहार की राजस्व व्यवस्था की एक मिश्रित तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के अनुसार, वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू होने के बाद राज्य के स्व-राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, लेकिन राज्य जीएसटी (SGST) संग्रह अब भी कई वर्षों से तय बजट लक्ष्य तक नहीं पहुंच सका है।
रिपोर्ट बताती है कि जीएसटी लागू होने से पहले बिहार का स्व-राजस्व औसतन 6.63 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा था। वहीं, जीएसटी व्यवस्था लागू होने के बाद यह वृद्धि दर बढ़कर 10.83 प्रतिशत तक पहुंच गई। इससे स्पष्ट है कि नई कर प्रणाली ने राज्य की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
बिहार में बढ़ा जीएसटी का दायरा
एक जुलाई 2017 से देशभर में जीएसटी लागू किया गया था। बिहार जैसे उपभोक्ता प्रधान राज्यों के लिए इसे राजस्व वृद्धि के लिहाज से अहम सुधार माना गया था। वर्तमान समय में बिहार में जीएसटी के तहत 6,68,866 करदाता पंजीकृत हैं।
राज्य के वाणिज्य-कर विभाग के कुल राजस्व संग्रह में जीएसटी की हिस्सेदारी करीब 78 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य की कर व्यवस्था में जीएसटी की भूमिका लगातार मजबूत हुई है।
बजट लक्ष्य से पीछे रहा SGST संग्रह
राजस्व वृद्धि के बावजूद राज्य जीएसटी संग्रह लगातार बजट अनुमान से कम रहा है। कैग रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2019-20 से एसजीएसटी संग्रह निर्धारित लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाया है।
वित्तीय वर्ष 2020 में 17,812 करोड़ रुपये के लक्ष्य के मुकाबले 15,800.53 करोड़ रुपये का संग्रह हुआ। इसी तरह वित्तीय वर्ष 2023 में 24,721 करोड़ रुपये के लक्ष्य के विरुद्ध 23,243.93 करोड़ रुपये ही जुटाए जा सके।
चार बड़ी वजहों ने बढ़ाई चुनौती
रिपोर्ट में एसजीएसटी संग्रह लक्ष्य से कम रहने के पीछे चार प्रमुख कारण बताए गए हैं। इनमें सबसे बड़ा कारण बिहार का कमजोर औद्योगिक आधार माना गया है। राज्य में विनिर्माण इकाइयों और बड़े उद्योगों की संख्या अपेक्षाकृत कम होने के कारण उत्पादन आधारित करों का बड़ा हिस्सा औद्योगिक राज्यों को मिलता है, जबकि बिहार को मुख्य रूप से उपभोग आधारित हिस्सा प्राप्त होता है।
दूसरा कारण कर चोरी को बताया गया है। हालांकि ई-वे बिल और ऑनलाइन निगरानी प्रणाली से कर चोरी पर काफी हद तक अंकुश लगा है, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार कुछ मामलों में अब भी अनियमितताएं सामने आती हैं।
तीसरी चुनौती छोटे व्यापारियों के लिए अनुपालन संबंधी जटिलताएं हैं। तकनीकी प्रक्रियाएं, रिफंड में देरी और कार्यशील पूंजी की दिक्कतें कई कारोबारियों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई हैं।
चौथा कारण जीएसटी मुआवजा व्यवस्था का समाप्त होना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बिहार जैसे अपेक्षाकृत कम स्व-राजस्व वाले राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव बढ़ा है।
एआई और डेटा इंटीग्रेशन पर सरकार का जोर
कर संग्रह को और प्रभावी बनाने के लिए सरकार अब आधुनिक तकनीक का सहारा ले रही है। जीएसटी, आयकर और सीमा शुल्क से जुड़े डेटाबेस को आपस में जोड़ने की दिशा में काम किया जा रहा है।
सरकार का उद्देश्य जोखिम का सटीक आकलन करना, कर चोरी की पहचान को आसान बनाना और मैनुअल हस्तक्षेप को कम करना है। साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुपालन प्रणाली, तेज रिफंड प्रक्रिया और डेटा इंटीग्रेशन के जरिए करदाताओं के लिए व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और सरल बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है।
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