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धर्म डेस्क : भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा इस वर्ष 16 जुलाई 2026 से शुरू होने जा रही है। नौ दिनों तक चलने वाले इस भव्य उत्सव में लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के दर्शन के लिए पहुंचेंगे। लेकिन हर बार श्रद्धालुओं का ध्यान सबसे पहले भगवान जगन्नाथ के अनोखे स्वरूप पर जाता है—विशाल गोल आंखें, बिना पलकों वाला चेहरा और सामान्य मूर्तियों से बिल्कुल अलग रूप। इसी स्वरूप से जुड़ा है ‘चक्का नैन’ का रहस्य।
भगवान जगन्नाथ की बड़ी आंखें क्या दर्शाती हैं?
भगवान जगन्नाथ की विशाल गोल आंखों को उनके सर्वज्ञ, सर्वव्यापी और सर्वदर्शी स्वरूप का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ईश्वर हर समय अपने भक्तों पर समान दृष्टि बनाए रखते हैं और सभी के कल्याण के लिए जागरूक रहते हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से इन आंखों को अनंत ज्ञान, करुणा और दिव्य चेतना का प्रतीक भी माना जाता है। मान्यता है कि भगवान किसी एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरी सृष्टि पर समान नजर रखते हैं।
आंखों में पलकें क्यों नहीं होतीं?
भगवान जगन्नाथ के स्वरूप की सबसे अनोखी बात उनकी आंखों में पलकों का न होना है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसका अर्थ है कि भगवान कभी अपने भक्तों से दृष्टि नहीं हटाते।
यह भी माना जाता है कि ईश्वर को विश्राम की आवश्यकता नहीं होती। वे हर पल संसार की व्यवस्था और भक्तों की रक्षा में लगे रहते हैं। इसलिए बिना पलक वाली आंखें निरंतर जागरूकता और अटूट संरक्षण का प्रतीक मानी जाती हैं।
क्यों कहा जाता है ‘चक्का नैन’?
‘चक्का नैन’ दो शब्दों से बना माना जाता है—‘चक्का’ यानी पूर्ण गोलाकार और ‘नैन’ यानी आंखें। भगवान जगन्नाथ की आंखें पूरी तरह गोल होने के कारण उन्हें प्रेमपूर्वक ‘चक्का नैन’ कहा जाता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार माता रोहिणी श्रीकृष्ण की वृंदावन और गोपियों से जुड़ी बाल लीलाओं का वर्णन कर रही थीं। उस समय श्रीकृष्ण और बलराम भी वहां पहुंच गए और बाहर खड़े होकर कथा सुनने लगे।
कहा जाता है कि जैसे-जैसे वे प्रेम और भक्ति से जुड़ी उन लीलाओं को सुनते गए, भाव-विभोर होकर उनकी आंखें अत्यंत विशाल हो गईं। इसी भाव को बाद में भगवान जगन्नाथ के स्वरूप में दर्शाया गया।
भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा अधूरी क्यों दिखाई देती है?
भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा अन्य पारंपरिक मूर्तियों से अलग दिखाई देती है क्योंकि इसमें हाथ-पैर पूर्ण रूप से निर्मित नहीं दिखते।
लोकप्रिय कथा के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान विष्णु की प्रतिमा बनवाने का संकल्प लिया था। विश्वकर्मा बढ़ई के रूप में प्रतिमा बना रहे थे और उन्होंने शर्त रखी थी कि काम पूरा होने तक कोई द्वार नहीं खोलेगा।
लेकिन प्रतीक्षा न कर पाने पर राजा ने बीच में द्वार खोल दिया। इसके बाद विश्वकर्मा वहां से अंतर्धान हो गए और प्रतिमा अधूरी रह गई। मान्यता है कि भगवान ने उसी स्वरूप को स्वीकार किया।
लकड़ी से ही क्यों बनती है भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा?
भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा पत्थर या धातु की नहीं, बल्कि विशेष पवित्र नीम की लकड़ी से बनाई जाती है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।
विशेष समय पर नवकलेवर अनुष्ठान किया जाता है, जिसमें पुराने विग्रहों के स्थान पर नई प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पुराने विग्रहों के ब्रह्म तत्व को अत्यंत गोपनीय विधि से नई प्रतिमाओं में स्थापित किया जाता है।
भगवान जगन्नाथ का स्वरूप क्या संदेश देता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान जगन्नाथ का स्वरूप यह संदेश देता है कि ईश्वर किसी एक रूप, सीमा या पहचान में बंधे नहीं हैं। उनकी विशाल आंखें पूरी मानवता पर समान दृष्टि और सभी के प्रति करुणा का प्रतीक मानी जाती हैं।
Navyug Samachar