
नेशनल डेस्क : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार में जल्द ही मंत्रिमंडल विस्तार और बड़े स्तर पर फेरबदल होने की चर्चा तेज हो गई है। माना जा रहा है कि तीसरे कार्यकाल में पहली बार प्रधानमंत्री अपनी टीम में बदलाव करते हुए कई मंत्रियों के विभाग बदल सकते हैं, जबकि नए चेहरों को भी जिम्मेदारी मिल सकती है। इसी क्रम में केंद्रीय सचिवों के साथ प्रधानमंत्री की हालिया बैठक को भी संभावित कैबिनेट विस्तार से जोड़कर देखा जा रहा है।
प्रधानमंत्री ने केंद्रीय सचिवों के साथ बैठक में विभिन्न मंत्रालयों के कामकाज और प्रदर्शन की समीक्षा की। बैठक में विभागों के रिपोर्ट कार्ड के जरिए यह आकलन किया गया कि किस मंत्रालय ने कितनी प्रगति की और आगे की प्राथमिकताएं क्या होंगी। माना जा रहा है कि इसी आधार पर नए मंत्रिमंडल की रूपरेखा तैयार की जा रही है।
कब हो सकता है कैबिनेट विस्तार?
संभावना जताई जा रही है कि संसद के मानसून सत्र से पहले 5 जुलाई तक या फिर प्रधानमंत्री की तीन देशों की यात्रा से 11 जुलाई को लौटने के बाद किसी भी समय मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल किया जा सकता है। माना जा रहा है कि सचिव स्तर पर तैयार किया जा रहा रोडमैप नई जिम्मेदारियों के अनुरूप ही तय किया जा रहा है।
क्यों जरूरी माना जा रहा है मंत्रिमंडल में बदलाव?
वर्तमान में प्रधानमंत्री समेत केंद्र सरकार में 72 मंत्री हैं, जिनमें 30 कैबिनेट मंत्री, 5 राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और 36 राज्य मंत्री शामिल हैं। लोकसभा की संख्या के अनुसार केंद्र सरकार में अधिकतम 81 मंत्री बनाए जा सकते हैं। इस हिसाब से अभी 9 मंत्री पद खाली हैं। इसके अलावा जॉर्ज कुरियन के इस्तीफे के बाद एक और पद रिक्त माना जा रहा है।
वहीं केंद्रीय मंत्री पंकज चौधरी को उत्तर प्रदेश और हर्ष मल्होत्रा को दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिलने के बाद उनके मंत्रिमंडल से बाहर होने की संभावना भी जताई जा रही है। इसके अलावा जॉर्ज कुरियन इस्तीफा दे चुके हैं, जबकि रवनीत सिंह बिट्टू के भी जल्द मंत्री पद छोड़ने की चर्चा है। कुछ मंत्रियों के प्रदर्शन की समीक्षा के आधार पर भी बदलाव संभव माना जा रहा है।
क्या बागी सांसदों को मिल सकती है मंत्री पद की जिम्मेदारी?
कैबिनेट विस्तार में उन सांसदों की भूमिका भी अहम मानी जा रही है जिन्होंने विभिन्न दलों से अलग होकर केंद्र सरकार का समर्थन किया है। आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) से जुड़े कई सांसदों के सत्ता पक्ष के साथ आने के बाद अब इस बात पर नजर है कि क्या इनमें से कुछ नेताओं को मंत्रिमंडल में जगह मिलेगी।
बताया जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से मिलकर खुद को एनसीपीआई नाम की पार्टी का हिस्सा बताया और केंद्र सरकार को समर्थन देने की बात कही। वहीं आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्य और शिवसेना (यूबीटी) के छह लोकसभा सदस्य भी सत्ता पक्ष के साथ आ चुके हैं, जिससे सरकार का संख्याबल बढ़ा है।
सहयोगी दलों का बढ़ सकता है प्रतिनिधित्व
मंत्रिमंडल विस्तार में सहयोगी दलों को भी अतिरिक्त महत्व मिलने की संभावना जताई जा रही है। तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों के समर्थन के बाद एनडीए का संख्याबल और मजबूत हुआ है। ऐसे में चर्चा है कि इन सांसदों में से कुछ को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है।
इसके अलावा राघव चड्ढा के साथ आए नेताओं में से भी किसी चेहरे को मौका मिलने की संभावना जताई जा रही है। उधर, शिवसेना (शिंदे गुट) की संसदीय ताकत बढ़ने के बाद यह भी माना जा रहा है कि पार्टी का केंद्रीय मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है। वर्तमान में शिवसेना (शिंदे) के सांसदों की संख्या 13 बताई जा रही है, जो जेडीयू से अधिक है। ऐसे में पार्टी अपने मंत्री पदों के कोटे में बढ़ोतरी की उम्मीद लगाए हुए है।
चुनावी राज्यों पर रहेगा विशेष फोकस
अगले वर्ष उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, पंजाब, मणिपुर, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें पंजाब और हिमाचल प्रदेश को छोड़कर बाकी राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। ऐसे में चुनावी राज्यों के राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए इन राज्यों का केंद्रीय मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व बढ़ाया जा सकता है।
करीब दो वर्षों के कार्यकाल के बाद मंत्रियों के प्रदर्शन की समीक्षा भी संभावित मानी जा रही है। समीक्षा के आधार पर कुछ मंत्रियों को पदोन्नति, कुछ को विभागीय बदलाव और कुछ को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। फिलहाल उत्तर प्रदेश से 10 मंत्री हैं, जबकि हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से एक-एक मंत्री हैं। पंजाब से रवनीत सिंह बिट्टू मंत्री हैं और उनकी जगह नए चेहरे को मौका मिलने की भी चर्चा है।
सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन पर भी रहेगा जोर
माना जा रहा है कि संभावित मंत्रिमंडल विस्तार में सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन का भी विशेष ध्यान रखा जाएगा। सरकार विभिन्न वर्गों और क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देने के साथ-साथ योग्य और प्रदर्शन करने वाले नेताओं को प्राथमिकता दे सकती है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विपक्ष की ओर से दलित और ओबीसी वर्ग से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाए जाने के बीच सरकार सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर भी मंत्रिमंडल का स्वरूप तय कर सकती है।
Navyug Samachar