
हेल्थ डेस्क: भारत में सर्वाइकल कैंसर महिलाओं के लिए गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बना हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार हर साल लाखों महिलाएं इस बीमारी की चपेट में आती हैं, जबकि बड़ी संख्या में मरीजों की समय पर पहचान नहीं हो पाती। ऐसे में कम लागत वाले स्वदेशी परीक्षणों ने बीमारी की शुरुआती जांच और रोकथाम को लेकर नई उम्मीदें जगाई हैं।
भारत में क्यों बढ़ रही है समस्या?
विशेषज्ञों का कहना है कि सर्वाइकल कैंसर का सबसे बड़ा कारण ह्यूमन पैपिलोमावायरस (एचपीवी) संक्रमण है। समय पर स्क्रीनिंग और जांच नहीं होने की वजह से कई मामलों में बीमारी का पता तब चलता है, जब वह गंभीर अवस्था में पहुंच चुकी होती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक देश में हर साल करीब 1.27 लाख नए मामले सामने आते हैं, जबकि लगभग 80 हजार महिलाओं की मौत इस बीमारी के कारण हो जाती है। यही वजह है कि इसे भारत की प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्याओं में गिना जाता है।
महंगे टेस्ट के बीच सस्ते विकल्प पर जोर
विशेषज्ञों का मानना है कि एचपीवी जांच सर्वाइकल कैंसर की पहचान का सबसे प्रभावी तरीका है, लेकिन इसकी ऊंची लागत बड़ी बाधा बनती है। दूसरी ओर वीआईए जांच अपेक्षाकृत सस्ती है, लेकिन इसका दायरा अभी भी सीमित है।
इसी चुनौती को देखते हुए कम लागत वाले स्वदेशी एचपीवी परीक्षणों पर जोर दिया जा रहा है, ताकि अधिक से अधिक महिलाओं तक जांच की सुविधा पहुंचाई जा सके।
क्या है पॉइंट-ऑफ-केयर टेस्टिंग?
विशेषज्ञों के अनुसार पॉइंट-ऑफ-केयर टेस्टिंग ऐसी व्यवस्था है, जिसमें जांच उसी स्थान पर की जाती है और परिणाम भी तुरंत मिल जाता है। इसके लिए नमूनों को बड़ी प्रयोगशालाओं में भेजने या लंबे समय तक रिपोर्ट का इंतजार करने की जरूरत नहीं पड़ती।
यदि ऐसे सस्ते और भरोसेमंद परीक्षण व्यापक स्तर पर उपलब्ध हो जाएं, तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और ग्रामीण इलाकों में भी आसानी से स्क्रीनिंग की जा सकेगी। इससे बीमारी की शुरुआती पहचान में बड़ी मदद मिल सकती है।
स्वदेशी तकनीक से मिल सकती है बड़ी राहत
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में विकसित किए जा रहे नए एचपीवी परीक्षणों का उद्देश्य उन प्रमुख वायरस प्रकारों की पहचान करना है, जो सर्वाइकल कैंसर के अधिकतर मामलों के लिए जिम्मेदार होते हैं।
इन परीक्षणों को इस तरह विकसित किया जा रहा है कि इन्हें जिला और उप-जिला स्तर की स्वास्थ्य सुविधाओं में भी आसानी से इस्तेमाल किया जा सके। साथ ही इन्हें संचालित करने के लिए अत्यधिक विशेषज्ञता की आवश्यकता न हो।
स्क्रीनिंग बढ़ाना सबसे बड़ी जरूरत
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि 30 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को नियमित अंतराल पर जांच करानी चाहिए। इससे कैंसर बनने से पहले की स्थिति या शुरुआती चरण में बीमारी की पहचान संभव हो सकती है।
हालांकि सरकारी कार्यक्रमों में स्क्रीनिंग की व्यवस्था होने के बावजूद बड़ी संख्या में महिलाएं जांच तक नहीं पहुंच पातीं, जिसके कारण बीमारी का बोझ लगातार बढ़ रहा है।
डब्ल्यूएचओ की क्या है सिफारिश?
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम के लिए एचपीवी जांच सबसे प्रभावी तरीका है। संगठन का मानना है कि यदि उच्च गुणवत्ता वाले परीक्षण उपलब्ध हों, तो 35 और 45 वर्ष की आयु में केवल दो बार स्क्रीनिंग भी पर्याप्त साबित हो सकती है।
समय पर जांच से बच सकती हैं हजारों जानें
विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता, नियमित स्क्रीनिंग और कम लागत वाली जांच सुविधाओं का विस्तार भारत में सर्वाइकल कैंसर से होने वाली मौतों को काफी हद तक कम कर सकता है। स्वदेशी तकनीक आधारित परीक्षण इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं और महिलाओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा को नई मजबूती दे सकते हैं।
Navyug Samachar