
नेशनल डेस्क: पुरी की विश्वप्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, समर्पण और सामाजिक सौहार्द की अनूठी मिसाल भी मानी जाती है। इस यात्रा से जुड़ी कई परंपराएं सदियों से निभाई जा रही हैं, जिनमें सबसे विशेष परंपरा भक्त सालबेग की मजार के सामने भगवान जगन्नाथ के नंदीघोष रथ का कुछ समय के लिए रुकना है। हर वर्ष यह दृश्य लाखों श्रद्धालुओं को यह संदेश देता है कि भगवान के लिए सबसे बड़ा महत्व सच्ची भक्ति का होता है।
रथयात्रा की सबसे भावुक परंपराओं में शामिल है यह पल
ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिनी जाती है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अलग-अलग विशाल रथों पर विराजमान होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक यात्रा करते हैं। लाखों श्रद्धालु रथ की रस्सियां खींचकर स्वयं को सौभाग्यशाली मानते हैं।
इसी यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ भक्त सालबेग की मजार के सामने कुछ समय के लिए रुकता है। इस परंपरा को भगवान और उनके परम भक्त के बीच अटूट श्रद्धा और प्रेम का प्रतीक माना जाता है।
लोकमान्यता के अनुसार ऐसे शुरू हुई यह परंपरा
लोकमान्यताओं के अनुसार, कई वर्ष पहले रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ अचानक एक स्थान पर रुक गया था। श्रद्धालुओं ने पूरी ताकत से रथ को आगे बढ़ाने का प्रयास किया, लेकिन रथ अपनी जगह से नहीं हिला।
इसी दौरान वहां मौजूद एक बुजुर्ग ने लोगों का ध्यान पास स्थित भक्त सालबेग की समाधि की ओर दिलाया। इसके बाद श्रद्धालुओं ने भगवान जगन्नाथ के जयकारों के साथ भक्त सालबेग का भी जयघोष किया। मान्यता है कि इसके तुरंत बाद रथ आगे बढ़ गया। तभी से यह विश्वास प्रचलित है कि भगवान जगन्नाथ हर वर्ष अपने प्रिय भक्त को सम्मान देने के लिए उनकी समाधि के सामने रुकते हैं।
कौन थे भक्त सालबेग?
भक्त सालबेग का जीवन 17वीं शताब्दी से जुड़ा माना जाता है। लोककथाओं के अनुसार, उनके पिता एक मुस्लिम मुगल सैनिक थे, जबकि उनकी माता हिंदू थीं। युद्ध में गंभीर रूप से घायल होने के बाद उनकी माता ने उन्हें भगवान जगन्नाथ का स्मरण करने की सलाह दी। कहा जाता है कि भगवान की कृपा से स्वस्थ होने के बाद सालबेग ने अपना पूरा जीवन प्रभु की भक्ति, भजन और आराधना को समर्पित कर दिया।
जब वे पुरी पहुंचे तो उस समय की सामाजिक और धार्मिक परंपराओं के कारण उन्हें जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली। इसके बावजूद उन्होंने कभी शिकायत नहीं की और मंदिर के बाहर रहकर भगवान का भजन-कीर्तन करते रहे। उनकी गहरी भक्ति के कारण आज उन्हें भगवान जगन्नाथ के महान भक्तों में गिना जाता है।
आज भी गूंजते हैं सालबेग के भक्ति गीत
सालबेग केवल भगवान जगन्नाथ के अनन्य भक्त ही नहीं, बल्कि ओड़िया भाषा के प्रमुख भक्ति कवि भी माने जाते हैं। उन्होंने भगवान की महिमा में अनेक भजन और काव्य रचनाएं कीं, जिन्हें आज भी ओडिशा में विशेष श्रद्धा के साथ गाया जाता है। रथयात्रा के दौरान उनके भजनों का विशेष महत्व माना जाता है।
आखिरी इच्छा बनी सदियों पुरानी परंपरा
लोकविश्वास के अनुसार, जीवन के अंतिम समय में सालबेग की सबसे बड़ी इच्छा भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने की थी। उन्होंने प्रार्थना की थी कि यदि वे स्वयं प्रभु के दर्शन न कर सकें, तो भगवान उनके पास अवश्य आएं। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ ने अपने भक्त की इस भावना का सम्मान किया और तभी से रथयात्रा के दौरान उनका रथ सालबेग की समाधि के सामने रुकने लगा। यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
भक्ति और सामाजिक समरसता का प्रतीक है यह परंपरा
सालबेग की कहानी केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक समरसता और धार्मिक सौहार्द का भी संदेश देती है। मुस्लिम पिता और हिंदू माता की संतान होने के बावजूद उनकी पहचान केवल भगवान जगन्नाथ के परम भक्त के रूप में बनी। यही कारण है कि उनकी मजार आज भी लाखों श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धा का केंद्र बनी हुई है।
भगवान जगन्नाथ के रथ का वहां रुकना यह संदेश देता है कि ईश्वर के लिए किसी व्यक्ति की जाति, धर्म, भाषा या जन्म नहीं, बल्कि उसकी निष्कलंक श्रद्धा और सच्ची भक्ति ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है।
Navyug Samachar