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26 सांसदों पर लटक रही अयोग्यता की तलवार! मॉनसून सत्र से पहले स्पीकर ओम बिरला ले सकते हैं बड़ा फैसला, बढ़ी सियासी हलचल

नेशनल डेस्क : देश की राजनीति में इन दिनों दल-बदल को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला जल्द ही तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के बागी सांसदों की सदस्यता से जुड़े मामलों पर अहम फैसला सुना सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक, संसद के मॉनसून सत्र की शुरुआत से पहले इस संवेदनशील मुद्दे पर निर्णय लिया जा सकता है। इस संभावित फैसले ने दोनों दलों और उनके बागी गुटों की चिंता बढ़ा दी है।

लोकसभा अध्यक्ष इस मामले में दोनों पक्षों की दलीलें पहले ही सुन चुके हैं। संबंधित प्रतिनिधिमंडलों के साथ बैठकों के बाद अब पूरे घटनाक्रम का कानूनी और संवैधानिक पहलुओं के आधार पर परीक्षण किया जा रहा है।

कानूनी कसौटी पर परखा जा रहा पूरा मामला

सूत्रों के अनुसार, किसी भी संभावित फैसले को कानूनी रूप से मजबूत बनाने के लिए संसदीय और संवैधानिक विशेषज्ञों की राय ली जा रही है। दल-बदल विरोधी कानून से जुड़े पुराने फैसलों और न्यायिक उदाहरणों का भी अध्ययन किया जा रहा है ताकि भविष्य में किसी कानूनी चुनौती की स्थिति में निर्णय टिकाऊ साबित हो सके।

टीएमसी में बगावत से बढ़ा सियासी संकट

साल 2024 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 29 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वर्तमान में एक सांसद के निधन के कारण एक सीट रिक्त है। इसी बीच पार्टी के 20 सांसदों ने अलग रास्ता अपनाते हुए पश्चिम बंगाल के हावड़ा स्थित पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ का साथ पकड़ लिया है।

बागी सांसदों ने लोकसभा में अलग बैठने की व्यवस्था की मांग की है। साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार को समर्थन देने और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल होने की इच्छा भी जताई है। दूसरी ओर, पार्टी नेतृत्व ने इन सांसदों के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए लोकसभा अध्यक्ष को अलग-अलग याचिकाएं सौंपकर उनकी सदस्यता समाप्त करने की मांग की है।

महाराष्ट्र में भी गहराया शिवसेना विवाद

महाराष्ट्र की राजनीति में भी अंदरूनी संघर्ष तेज हो गया है। शिवसेना (यूबीटी) के चुनाव चिह्न पर निर्वाचित 9 सांसदों में से 6 सांसद एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ चले गए हैं।

इस घटनाक्रम के विरोध में उद्धव गुट के वरिष्ठ नेताओं ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात कर बागी सांसदों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। साथ ही बागी सांसदों द्वारा दिए गए पत्रों की प्रतियां उपलब्ध कराने का अनुरोध भी किया गया। इस दौरान अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि उन्हें अभी तक बागी सांसदों की ओर से कोई लिखित दस्तावेज प्राप्त नहीं हुआ है।

दल-बदल कानून को लेकर आमने-सामने दोनों दल

तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) दोनों अपने-अपने बागी सांसदों को अयोग्य घोषित कराने की मांग पर कायम हैं। दोनों दलों का तर्क है कि दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता से बचने का प्रावधान तभी लागू होता है जब किसी राजनीतिक दल का कम से कम दो-तिहाई हिस्सा औपचारिक रूप से किसी अन्य दल में विलय कर ले।

पार्टी नेताओं का कहना है कि केवल सांसदों या विधायकों का समूह, चाहे उसकी संख्या दो-तिहाई ही क्यों न हो, स्वतंत्र रूप से किसी दूसरे राजनीतिक दल में शामिल होकर अयोग्यता से नहीं बच सकता।

संसद में बदल सकती है बैठने की तस्वीर

आगामी मॉनसून सत्र को देखते हुए लोकसभा सचिवालय नई बैठने की व्यवस्था तैयार करने में जुटा हुआ है। बागी सांसदों के अलग बैठने की मांग के बीच एक और राजनीतिक बदलाव सामने आया है। द्रमुक ने भी सदन में कांग्रेस से अलग बैठने की इच्छा जताई है।

बताया जा रहा है कि द्रमुक ने कांग्रेस से राजनीतिक दूरी बनाते हुए मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की नई पार्टी टीवीके के साथ हाथ मिला लिया है। ऐसे में संसद के आगामी सत्र में सदन की तस्वीर और राजनीतिक समीकरण दोनों बदले हुए नजर आ सकते हैं।

 

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