
आगरा: ताजमहल, पेठा और चमड़े के जूतों के लिए दुनियाभर में मशहूर आगरा की पहचान सिर्फ इतनी ही नहीं है। उत्तर प्रदेश का यह ऐतिहासिक शहर एक ऐसे संस्थान के लिए भी जाना जाता है, जिसे कभी पूरे देश में “पागलखाना” कहकर पुकारा जाता था। 166 साल पुराना यह संस्थान आज मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और शोध के क्षेत्र में देश के प्रमुख केंद्रों में शामिल है।
1857 की क्रांति के बाद शुरू हुई थी कहानी
आगरा में मानसिक अस्पताल की स्थापना का इतिहास 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा हुआ है। इतिहासकारों के अनुसार, उस समय उत्तर-पश्चिम प्रांत के लेफ्टिनेंट गवर्नर जॉन रसेल केल्विन आगरा में तैनात थे। झांसी, मेरठ और आगरा में अंग्रेजी शासन के खिलाफ बढ़ते विद्रोह ने ब्रिटिश प्रशासन की नींद उड़ा दी थी।
बताया जाता है कि लगातार बढ़ते दबाव और अस्थिर हालात के कारण केल्विन गंभीर मानसिक तनाव का शिकार हो गए थे। विद्रोह के दौरान अंग्रेज अधिकारियों और उनके परिवारों को सुरक्षा के लिए आगरा किले में रखा गया था। हालात इतने खराब हो गए कि केल्विन का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा और बाद में हैजा की चपेट में आने के बाद 9 सितंबर 1857 को उनकी मौत हो गई।
आगरा किले में आज भी मौजूद है कब्र
इतिहासकारों के मुताबिक, क्रांतिकारियों के भय से अंग्रेज अधिकारियों ने केल्विन को आगरा किले के दीवान-ए-आम के सामने दफना दिया था। उनकी कब्र आज भी वहां मौजूद बताई जाती है। उस दौर में कई ब्रिटिश सैनिक और अधिकारी भी तनाव और अवसाद की समस्याओं से जूझ रहे थे।
इन्हीं परिस्थितियों की समीक्षा के बाद ब्रिटिश शासन ने मानसिक रोगियों के लिए विशेष अस्पताल की आवश्यकता महसूस की। इसके बाद वर्ष 1859 में आगरा में मानसिक अस्पताल की स्थापना की गई, जिसे उस समय देश का चौथा मानसिक चिकित्सालय माना जाता था।
महारानी विक्टोरिया के आदेश पर हुई थी स्थापना
जानकारों के अनुसार, 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया ने पूरे घटनाक्रम की समीक्षा करवाई थी। रिपोर्ट में अधिकारियों और सैनिकों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़े असर का उल्लेख किया गया, जिसके बाद आगरा में मानसिक अस्पताल स्थापित करने का निर्णय लिया गया।
शुरुआती दौर में इसे आम बोलचाल में “पागलखाना” कहा जाता था, लेकिन समय के साथ मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ने पर इसकी पहचान और स्वरूप दोनों बदल गए।
देश के प्रमुख मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों में बना पहचान
संस्थान के निदेशक डॉ. दिनेश सिंह राठौर के अनुसार, शुरुआती वर्षों में इसका प्रशासन जेल विभाग के अधीन रहा। वर्ष 1934 में डॉ. बनारसी दास इसके पहले भारतीय अधीक्षक बने। बाद में यहां मनोचिकित्सा शिक्षा और शोध कार्यों की शुरुआत हुई।
1955 में यहां एमडी मनोचिकित्सा पाठ्यक्रम शुरू किया गया। इसके बाद संस्थान ने मानसिक रोगों के उपचार और अनुसंधान के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के शोध का भी बना केंद्र
संस्थान का स्वर्णिम काल 1957 से 1975 के बीच माना जाता है। इसी दौरान विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहयोग से सिजोफ्रेनिया पर अंतरराष्ट्रीय अध्ययन किया गया। इस शोध में अमेरिका, इंग्लैंड और भारत सहित सात देशों ने भाग लिया था।
विशेष बात यह रही कि एशिया से आगरा का यह संस्थान इस महत्वपूर्ण अध्ययन में शामिल होने वाला प्रमुख केंद्र बना। शोध में यह निष्कर्ष सामने आया कि परिवार के साथ रहकर इलाज कराने वाले मरीजों में सुधार की संभावना अधिक होती है। इसके बाद दुनिया के कई मानसिक अस्पतालों में परिवार वार्ड की अवधारणा शुरू हुई।
2001 में बदला गया नाम, बदली पहचान
समय के साथ मानसिक रोगों को लेकर समाज का नजरिया बदला तो संस्थान का नाम भी बदल दिया गया। 8 फरवरी 2001 को “मानसिक अस्पताल” की जगह इसका नाम “मानसिक स्वास्थ्य संस्थान एवं चिकित्सालय” रखा गया।
बाद के वर्षों में यहां एमडी मनोचिकित्सा के साथ एमफिल क्लीनिकल साइकोलॉजी, मनोरोग सामाजिक कार्य और नर्सिंग जैसे पाठ्यक्रम भी शुरू किए गए।
आज भी मात्र 50 रुपये में बनता है पर्चा
वर्तमान में संस्थान में मानसिक रोगों के उपचार, शोध और प्रशिक्षण की आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। यहां वृद्धजन मनोरोग क्लीनिक, बाल एवं किशोर मानसिक स्वास्थ्य क्लीनिक, साइको-सेक्सुअल क्लीनिक और 24 घंटे टेलीमेडिसिन सेवा संचालित की जा रही है।
ओपीडी में मरीज का पर्चा मात्र 50 रुपये में बनाया जाता है। मरीजों की काउंसलिंग के लिए विशेषज्ञ मनोवैज्ञानिकों की टीम मौजूद रहती है। गंभीर मानसिक बीमारियों से लेकर तनाव और अवसाद जैसी समस्याओं का भी यहां उपचार किया जाता है। संस्थान को भविष्य में राष्ट्रीय स्तर के उन्नत मानसिक स्वास्थ्य केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में भी प्रयास जारी हैं।
Navyug Samachar