
छत्तीसगढ़ डेस्क: देश की आजादी के 79 साल बाद बस्तर के उन सुदूर और दुर्गम इलाकों में भी इस बार स्वतंत्रता दिवस का सार्वजनिक आयोजन होने जा रहा है, जहां लंबे समय तक नक्सली हिंसा के चलते राष्ट्रीय पर्व मनाना चुनौती बना रहा। बस्तर संभाग के 92 गांवों में पहली बार सार्वजनिक तौर पर तिरंगा फहराया जाएगा। इनमें बीजापुर के 33, सुकमा के 50 और नारायणपुर के 9 गांव शामिल हैं।
इन गांवों में होने वाला ध्वजारोहण महज एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं माना जा रहा है। इसे हिंसा और भय के लंबे दौर से निकलकर लोकतंत्र, विकास और सामान्य जीवन की ओर बढ़ते बस्तर में आए बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
चार दशक से अधिक समय बाद बदली तस्वीर
नक्सल प्रभावित इलाकों में लंबे समय तक स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों का सार्वजनिक आयोजन सुरक्षा कारणों से संभव नहीं हो पाता था। कई इलाकों में प्रशासन की पहुंच सीमित थी और ग्रामीण भी खुले तौर पर राष्ट्रीय कार्यक्रमों में शामिल होने से बचते थे।
अब सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने और विकास कार्यों के विस्तार के साथ इन क्षेत्रों की स्थिति में बदलाव देखने को मिल रहा है। जिन गांवों में कभी राष्ट्रीय पर्व मनाना मुश्किल था, वहां इस बार ग्रामीण तिरंगे के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहे हैं।
ताड़मेटला से टेकलगुड़ेम तक बदलाव की तस्वीर
बस्तर के ताड़मेटला, सिलगर, टेकलगुड़ेम, धरानी बोदली और एर्राबोर जैसे इलाके लंबे समय तक नक्सली हिंसा के लिए चर्चा में रहे हैं। इन क्षेत्रों में कभी गोलियों और हिंसा का माहौल रहा, लेकिन अब इन्हीं इलाकों में पहली बार राष्ट्रीय ध्वज फहराने की तैयारी है।
ग्रामीणों में अपने गांव में तिरंगा फहराए जाने को लेकर उत्साह है। उनके लिए यह आयोजन केवल स्वतंत्रता दिवस मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे अपने क्षेत्र में लौटती शांति और सामान्य जीवन की शुरुआत के तौर पर भी देखा जा रहा है।
92 गांवों में पहली बार होगा सार्वजनिक ध्वजारोहण
स्वतंत्रता दिवस पर बस्तर संभाग के 92 गांवों में पहली बार सार्वजनिक रूप से तिरंगा फहराया जाएगा। बीजापुर के 33, सुकमा के 50 और नारायणपुर के 9 गांव इस सूची में शामिल हैं।
इन इलाकों में प्रशासन और सुरक्षा बलों की मौजूदगी में राष्ट्रीय पर्व का आयोजन किया जाएगा। वर्षों तक नक्सली हिंसा से प्रभावित रहे इन गांवों में स्वतंत्रता दिवस को लेकर उत्साह का माहौल है।
इन आयोजनों को शांति, सुरक्षा, लोकतंत्र और विकास की दिशा में बस्तर में हो रहे बदलाव से जोड़कर देखा जा रहा है। जिन क्षेत्रों में पहले राष्ट्रीय पर्वों का सार्वजनिक आयोजन संभव नहीं था, वहां अब तिरंगे को सम्मान के साथ फहराने की तैयारी है।
500 से ज्यादा सार्वजनिक स्थानों को मिलेगा शहीद जवानों का नाम
बस्तर में शांति स्थापित करने के दौरान जान गंवाने वाले सुरक्षा बलों के जवानों की स्मृति को जीवित रखने के लिए भी विशेष पहल की गई है। संभाग के 500 से अधिक स्कूलों, सामुदायिक भवनों, चौराहों और अन्य सार्वजनिक संस्थानों का नाम शहीद जवानों के नाम पर रखा जाएगा।
इस पहल का उद्देश्य नई पीढ़ी को शहीद जवानों के साहस, बलिदान और राष्ट्रसेवा से परिचित कराना है। सार्वजनिक स्थानों को उनके नाम से जोड़कर बस्तर में शांति के लिए दिए गए बलिदान को याद रखने का प्रयास किया जाएगा।
तिरंगा बना बस्तर में बदलते माहौल की पहचान
बस्तर के इन 92 गांवों में पहली बार सार्वजनिक तौर पर होने वाला ध्वजारोहण क्षेत्र में बदलते माहौल की अहम तस्वीर पेश करेगा। वर्षों तक हिंसा से प्रभावित रहे इलाकों में अब राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान के साथ स्वतंत्रता दिवस मनाया जाना शांति और सामान्य जीवन की ओर बढ़ते कदम के तौर पर देखा जा रहा है।
ग्रामीण स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगे को सलामी देने के साथ देश की सुरक्षा के लिए अपना जीवन बलिदान करने वाले शहीद जवानों को भी श्रद्धांजलि देंगे। 79 साल बाद इन 92 गांवों में पहली बार सार्वजनिक रूप से तिरंगा फहराया जाना बस्तर के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में सामने आएगा।
Navyug Samachar