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सरदार पटेल: 562 रियासतों को एकजुट कर गढ़ा अखंड भारत, इसलिए कहलाए लौह पुरुष

नेशनल डेस्क: भारत के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आजाद देश की एकता और अखंडता को मजबूत करने तक सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका ऐतिहासिक रही है। अपने साहस, दृढ़ इच्छाशक्ति, दूरदर्शिता और कुशल नेतृत्व के दम पर उन्होंने आधुनिक भारत की नींव मजबूत करने में अहम योगदान दिया। यही वजह है कि उन्हें देश का लौह पुरुष कहा जाता है। 31 अक्टूबर को उनकी जयंती और राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाया जाता है। उनका जीवन आज भी देशवासियों को एकता, अनुशासन और राष्ट्रसेवा की प्रेरणा देता है।

खेड़ा के गांव में हुआ था जन्म

वल्लभभाई झावेरभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के खेड़ा जिले के करमसद गांव में हुआ था। वह अपने पिता झावेरभाई और मां लाडबा पटेल के चौथे पुत्र थे। बचपन से ही उनमें नेतृत्व क्षमता और न्याय के प्रति विशेष लगाव दिखाई देने लगा था। स्कूली दिनों में उन्होंने अपने शिक्षक के खिलाफ आवाज उठाकर छात्रों को अनावश्यक आर्थिक बोझ से बचाने का प्रयास किया था। इसे उनके नेतृत्व कौशल की शुरुआती झलक माना जाता है।

उनकी शिक्षा का सफर भी आसान नहीं रहा। 22 वर्ष की उम्र में उन्होंने दसवीं की परीक्षा पास की। इसके बाद वर्ष 1908 में इंग्लैंड जाकर बैरिस्टर की डिग्री हासिल की। अहमदाबाद लौटने के बाद उन्होंने फौजदारी वकालत में अपनी अलग पहचान बनाई और कई कानूनी मामलों में लोगों की मदद की।

निजी जीवन में भी उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उनकी पत्नी झबेरबा का 33 वर्ष की उम्र में निधन हो गया था। उनके दो बच्चे थे और उस दौर में उनके पास अपना मकान तक नहीं था।

महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम में निभाई अहम भूमिका

सरदार पटेल का राजनीतिक जीवन महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा। वर्ष 1942 में जब गांधीजी ने भारत छोड़ो आंदोलन का ऐलान किया, तब पटेल ने अहमदाबाद के लोकल बोर्ड मैदान में एक लाख से अधिक लोगों को संबोधित किया। उन्होंने आंदोलन की रणनीति समझाते हुए कहा कि यदि सभी नेता गिरफ्तार भी हो जाएं, तब भी जनता के पास इतनी ताकत है कि वह महज 24 घंटे में ब्रिटिश शासन को चुनौती दे सकती है।

उनके भाषण और नेतृत्व ने आंदोलन में शामिल लोगों के भीतर उत्साह और आत्मविश्वास पैदा किया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उनकी संगठन क्षमता और रणनीतिक सूझबूझ ने उन्हें प्रमुख नेताओं की पंक्ति में खड़ा कर दिया।

गृहमंत्री बनकर 562 रियासतों के एकीकरण की संभाली जिम्मेदारी

आजादी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक देशी रियासतों को भारतीय संघ में शामिल करना था। उस समय देश में 562 रियासतें थीं। सितंबर 1946 में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनने के बाद पटेल को गृहमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने इस चुनौतीपूर्ण काम को अपनी राजनीतिक समझ, दृढ़ इच्छाशक्ति और कूटनीतिक रणनीति के जरिए आगे बढ़ाया।

जूनागढ़, हैदराबाद, भोपाल और अन्य रियासतों के भारत में विलय की प्रक्रिया में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। हैदराबाद के निजाम के भारत में शामिल होने से इनकार करने पर पटेल ने सैन्य कार्रवाई का फैसला लिया, जिसके बाद निजाम को आत्मसमर्पण करना पड़ा। जूनागढ़ में जनता के विरोध के बाद वहां के नवाब ने पाकिस्तान का रुख किया। वहीं भोपाल के नवाब हमीदुल्ला खान ने स्वतंत्र रहने या पाकिस्तान में शामिल होने की इच्छा जताई थी, लेकिन पटेल के प्रयासों के बाद भोपाल का भारत में विलय हुआ। 1 जून 1949 को भोपाल भारतीय संघ का हिस्सा बन गया।

विदेश नीति के मुद्दों पर भी पटेल की अपनी स्पष्ट राय थी। तिब्बत को लेकर चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई की मांग पर उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को सतर्क रहने की सलाह दी थी। उनका मानना था कि भारत को इस मामले में सावधानी बरतनी चाहिए।

भावनगर में सरदार पटेल पर हुआ था जानलेवा हमला

सरदार पटेल के जीवन से जुड़ी 14 मई 1939 की एक घटना भी काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। 14 और 15 मई को भावनगर राज्य परिषद की पांचवीं बैठक आयोजित की गई थी, जिसकी अध्यक्षता पटेल कर रहे थे। इसी दौरान जब वह खुली जीप से जा रहे थे, तभी नगीना मस्जिद के पास 57 हथियारबंद हमलावरों ने उन पर हमला कर दिया। हमलावरों के पास तलवारें और भाले थे।

इस हमले में दो युवा कार्यकर्ताओं बच्चूभाई पटेल और फूलभाई मोदी ने अपनी जान गंवा दी। दोनों ने हमलावरों का सामना करते हुए सरदार पटेल की जान बचाई। बच्चूभाई ने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया, जबकि फूलभाई मोदी की अस्पताल में मौत हो गई।

हमले के बाद ब्रिटिश शासन ने गठित की थी विशेष अदालत

घटना की जांच के लिए ब्रिटिश शासन ने विशेष अदालत का गठन किया था। इस मामले में 57 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें आजाद अली और रुस्तम अली नाम के दो सिपाहियों को फांसी की सजा सुनाई गई, जबकि 15 अन्य आरोपियों को उम्रकैद की सजा दी गई।

इतिहास में कम चर्चा का विषय बनी यह घटना

भावनगर में हुए हमले का जिक्र इतिहास की मुख्यधारा में अपेक्षाकृत कम मिलता है। इसे लेकर अलग-अलग कारण बताए जाते हैं। एक संभावना यह भी जताई गई कि हमलावरों की धार्मिक पहचान सार्वजनिक होने से सांप्रदायिक तनाव बढ़ने की आशंका रही होगी। इसके अलावा, उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों और कांग्रेस के भीतर मतभेदों को भी इस घटना के कम चर्चित रहने की वजह माना जाता है। हालांकि, इन कारणों को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं सामने आती रही हैं।

राजनीति से इतर भी किए कई महत्वपूर्ण काम

सरदार पटेल का योगदान केवल स्वतंत्रता आंदोलन और रियासतों के एकीकरण तक सीमित नहीं था। उन्होंने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण, गांधी स्मारक निधि की स्थापना और कमला नेहरू अस्पताल की रूपरेखा तैयार करने जैसे कार्यों में भी भूमिका निभाई। गोवा को भारत में शामिल कराने की उनकी इच्छा भी स्पष्ट थी। एक अवसर पर भारतीय युद्धपोत के जरिए गोवा की स्थिति का आकलन कर आगे की कार्रवाई की तैयारी की गई थी।

जवाहरलाल नेहरू के साथ कई मुद्दों पर उनके विचार अलग-अलग थे, लेकिन महात्मा गांधी से किए वादे और राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए उन्होंने सहयोग बनाए रखा। गंभीर राजनीतिक मुद्दों को सहज और विनोदी अंदाज में रखने के लिए भी पटेल जाने जाते थे। कश्मीर के संदर्भ में उनका एक कथन अक्सर उद्धृत किया जाता है, जिसमें उन्होंने जवाहरलाल नेहरू की ससुराल का जिक्र करते हुए हल्के-फुल्के अंदाज में अपनी बात रखी थी।

सादगीपूर्ण जीवन और मजबूत इच्छाशक्ति बनी पहचान

सरदार पटेल का निजी जीवन सादगी और नैतिक मूल्यों पर आधारित था। उन्होंने व्यक्तिगत लाभ के बजाय देशहित को प्राथमिकता दी। उनकी प्रशासनिक क्षमता, दृढ़ फैसले लेने का साहस और संगठन कौशल ने उन्हें स्वतंत्र भारत के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल किया।

15 दिसंबर 1950 को 76 वर्ष की आयु में हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया। देश की एकता और अखंडता के लिए किए गए उनके कार्यों के कारण उन्हें लौह पुरुष के रूप में याद किया जाता है। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि मजबूत नेतृत्व, दूरदर्शिता और सामूहिक प्रयास से बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना किया जा सकता है।

राष्ट्रीय एकता दिवस पर सरदार पटेल की स्मृति देश को एकजुट रहने और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का संदेश देती है। आधुनिक भारत की एकता और अखंडता को मजबूत बनाने में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा।

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