नेशनल डेस्क: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। इस विवाद के बीच चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर अपने फैसलों का बचाव किया है। आयोग का कहना है कि एसआईआर से जुड़े अहम निर्णय सामूहिक रूप से लिए गए और किसी एक आयुक्त ने अकेले फैसला नहीं किया। हलफनामे के मुताबिक, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी ने आयोग की ओर से जवाब दाखिल करने की मंजूरी भी सर्वसम्मति से दी थी। हालांकि, अलग-अलग मामलों में दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से पहले दर्ज की गई टिप्पणियों और आपत्तियों के चलते कई सवाल अब भी बने हुए हैं।
फॉर्म-6 में बदलाव पर विवाद, आयोग ने दी सफाई
मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 को लेकर भी आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं। एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, मई में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने कहा था कि फॉर्म-6 में बदलाव करने के लिए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 में संशोधन करना जरूरी होगा। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी इस राय का समर्थन किया था।
इसके बावजूद जुलाई में फॉर्म-6 के ऑनलाइन संस्करण में एक अतिरिक्त घोषणा दिखाई देने लगी। संधू को इसकी जानकारी एक अखबार की रिपोर्ट के माध्यम से मिली। अगस्त में उन्होंने ऑनलाइन आवेदन में जोड़ी गई घोषणा को अनधिकृत और अवैध बताते हुए आपत्ति दर्ज की थी।
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में चुनाव आयोग ने कहा कि यह घोषणा फॉर्म-6 में संशोधन नहीं थी, बल्कि एक अलग दस्तावेज था। आयोग ने माना कि ऑनलाइन आवेदन में इसे जिस तरह प्रदर्शित किया गया, उससे ऐसा प्रतीत हो सकता था कि मूल फॉर्म में बदलाव किया गया है। आयोग के मुताबिक, 21 अक्टूबर को निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण प्रभाग ने ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में फॉर्म-6 और एसआईआर से संबंधित घोषणा को अलग-अलग करने का फैसला लिया।
घोषणा जोड़ने की मंजूरी किसने दी, सवाल अब भी कायम
आयोग की सफाई के बावजूद यह सवाल बना हुआ है कि जुलाई में ऑनलाइन आवेदन के साथ अतिरिक्त घोषणा जोड़ने का फैसला किसने लिया था। जब दोनों चुनाव आयुक्त इस तरह के बदलाव पर पहले ही अपनी आपत्तियां दर्ज करा चुके थे, तो यह व्यवस्था लागू कैसे हुई, इस पर भी सवाल उठे हैं।
आयोग का कहना है कि फॉर्म-6 में कोई औपचारिक संशोधन नहीं किया गया था। हालांकि, ऑनलाइन आवेदन में घोषणा को प्रदर्शित करने के तरीके को लेकर आयोग ने खुद स्वीकार किया कि इससे भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती थी। ऐसे में विवाद केवल दस्तावेज की कानूनी स्थिति तक सीमित नहीं है, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है।
ईसीआईनेट पर सवाल, आयोग ने बताई अधिकारियों की जिम्मेदारी
चुनाव आयोग के डिजिटल मंच ईसीआईनेट की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए गए। इस मंच का इस्तेमाल मतदाता सूची से जुड़े विभिन्न कार्यों में किया जाता है। आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें नाम जोड़ने, हटाने या संशोधन करने की वैधानिक जिम्मेदारी निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी यानी ईआरओ की होती है।
आयोग के मुताबिक, संबंधित अधिकारी के आदेश के बिना किसी मतदाता का नाम जोड़ने, हटाने या उसमें बदलाव करने की कार्रवाई नहीं की जाती। सॉफ्टवेयर का उद्देश्य अधिकारियों को उनके कानूनी अधिकारों के तहत काम करने में सहायता देना है।
आयोग ने आईटी व्यवस्था की कानूनी समीक्षा और नए तकनीकी मॉड्यूल की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति का भी उल्लेख किया। इसमें भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुंबई और भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु के विशेषज्ञों को शामिल करने की व्यवस्था बताई गई है।
डेटाबेस के अधिकारों के केंद्रीकरण पर पहले भी जताई गई थी चिंता
रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 29 मई को सुझाव दिया था कि मतदाता सूची के डेटाबेस में बदलाव करने के अधिकारों की स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए। उन्होंने अधिकारों के धीरे-धीरे केंद्रीकरण पर चिंता जताते हुए किसी बाहरी विशेषज्ञ से यह प्रमाणित कराने का प्रस्ताव रखा था कि डेटाबेस में बदलाव का अधिकार केवल संबंधित वैधानिक अधिकारियों के पास हो।
चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी जुलाई में इस सुझाव का समर्थन किया था। हालांकि, 14 अगस्त को दर्ज टिप्पणी में उन्होंने कहा था कि उनके पहले दिए गए सुझावों पर क्या कार्रवाई हुई, इसकी जानकारी उन्हें नहीं थी।
अब आयोग ने विशेषज्ञ समिति का जिक्र किया है, लेकिन हलफनामे में मई में दिए गए इस विशिष्ट सुझाव का उल्लेख नहीं किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं। विवाद का एक अहम पहलू यह भी है कि तकनीकी व्यवस्था में बदलाव और उस पर निगरानी के संबंध में आयोग के भीतर दर्ज टिप्पणियों को किस तरह आगे बढ़ाया गया।
गोवा में 97 मतदाताओं का मामला भी चर्चा में
गोवा में मतदाता सूची से बाहर रह गए 97 लोगों का मामला भी आयोग के हलफनामे का हिस्सा है। आयोग के अनुसार, इनमें से 88 लोगों ने बाद में फॉर्म-6 के माध्यम से आवेदन किया, जिन्हें स्वीकार कर लिया गया। छह लोग विदेश में थे, जबकि तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट था।
हालांकि, इससे पहले सामने आई समस्या को लेकर सवाल बने हुए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा के निर्वाचन अधिकारियों ने सात दिनों के भीतर आठ बार सॉफ्टवेयर में जरूरी बदलाव करने का अनुरोध किया था, ताकि मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से जुड़े फैसलों को पलटने के उनके आदेश लागू किए जा सकें।
आयोग के एक उप निर्वाचन आयुक्त ने भी टिप्पणी की थी कि आईटी व्यवस्था अधिकारियों की जरूरी कार्रवाई में बाधा नहीं बननी चाहिए। अब हलफनामे में 88 लोगों के आवेदन स्वीकार होने की जानकारी दी गई है, लेकिन फरवरी में अधिकारियों को अपने आदेश लागू करने में किन दिक्कतों का सामना करना पड़ा था, इस पर विस्तृत स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
पश्चिम बंगाल में अपीलों को लेकर भी उठे सवाल
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ दाखिल अपीलों का मामला भी विवाद का हिस्सा है। चुनाव आयोग ने कहा कि ये अपीलें राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय में तैनात अधिकारियों ने दाखिल की थीं और यह मामला आयोग के समक्ष नहीं लाया गया था। आयोग के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत संबंधित अधिकारियों को अपील करने का अधिकार था।
रिपोर्ट के अनुसार, 7 अगस्त को अपीलों से संबंधित खबर सामने आने के बाद चुनाव आयुक्त विवेक जोशी के कार्यालय ने संबंधित अधिकारी से मामले की स्थिति पूछी थी। इसके पांच दिन बाद सुखबीर सिंह संधू ने भी इस विषय पर कई सवाल उठाए थे।
संधू की टिप्पणी के मुताबिक, विवेक जोशी ने उन्हें बताया था कि उनके पास मामले की पूरी जानकारी नहीं है। संधू ने यह भी दर्ज किया था कि पश्चिम बंगाल की मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने उनसे कहा था कि उन्हें भी मामले का पूरा विवरण नहीं मालूम था।
अब आयोग ने 22 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय से मिले पत्र का हवाला देते हुए कहा है कि अपीलें उसी कार्यालय के अधिकारियों ने दाखिल की थीं। हालांकि, पहले दर्ज टिप्पणियों और बाद में दिए गए स्पष्टीकरण के बीच तालमेल को लेकर सवाल उठे हैं। यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि समान आधार पर बड़ी संख्या में अपीलें किस प्रक्रिया के तहत दाखिल की गईं और प्रत्येक मामले की अलग-अलग जांच किस तरह हुई।
आयोग का दावा- सभी बड़े फैसले सामूहिक रूप से लिए गए
चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में कहा कि वह तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था है और उसके फैसले सामूहिक प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं। आयोग के अनुसार, किसी फाइल पर एक चुनाव आयुक्त की टिप्पणी, सवाल या सुझाव को अपने आप आयोग का अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता।
आयोग ने बताया कि सामान्य प्रक्रिया में फाइल पहले एक चुनाव आयुक्त, फिर दूसरे चुनाव आयुक्त और उसके बाद मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पास जाती है। आवश्यक मामलों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मंजूरी भी ली जा सकती है, जिसे बाद में संबंधित फाइल में दर्ज किया जाता है।
आयोग का दावा है कि एसआईआर से जुड़े प्रमुख आदेशों को तीनों सदस्यों की मंजूरी मिली थी। इसके बावजूद अलग-अलग समय पर दर्ज की गई आपत्तियों, फैसलों की जानकारी मिलने में हुई देरी और तकनीकी व्यवस्था से जुड़ी शिकायतों ने निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े किए हैं।
फिलहाल, चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामे के जरिए सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का बचाव किया है। वहीं, फॉर्म-6, ईसीआईनेट, गोवा और पश्चिम बंगाल से जुड़े मामलों में उठे सवालों के बीच यह मुद्दा महत्वपूर्ण बना हुआ है कि आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई और संबंधित फैसले किस प्रक्रिया के तहत लागू किए गए।
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