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नाना पाटेकर का ऐसा था संघर्ष, 35 रुपये की मजदूरी से घर चलाया, पोस्टर और जेब्रा क्रॉसिंग पेंट कर बने बॉलीवुड के दिग्गज

मनोरंजन डेस्क: दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं रहे। 8 अक्टूबर को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से फिल्म इंडस्ट्री और उनके फैंस को बड़ा झटका लगा है। करीब 5 दशक लंबे फिल्मी सफर में नाना ने बिना किसी गॉडफादर के अपनी अलग पहचान बनाई। छोटे और सहायक किरदारों से शुरुआत करने वाले नाना आगे चलकर बड़े स्टार बने। हालांकि, इस मुकाम तक पहुंचने का उनका सफर बिल्कुल आसान नहीं था।

छोटे किरदारों से शुरू हुआ था सफर

नाना पाटेकर ने साल 1978 में फिल्म ‘गमन’ से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद उन्होंने ‘सिंहासन’, ‘अंकुश’ और ‘प्रतिघात’ जैसी फिल्मों में काम किया। उनके करियर में फिल्म ‘अग्निसाक्षी’ को अहम मोड़ माना गया। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था।

नाना की प्रमुख फिल्मों में ‘क्रांतिवीर’, ‘अपहरण’, ‘अंगार’, ‘परिंदा’, ‘राजू बन गया जेंटलमैन’, ‘खामोशी’ और ‘तिरंगा’ जैसी फिल्में शामिल हैं। अपनी दमदार अदाकारी, अभिनय की गहराई और संवाद बोलने के खास अंदाज के लिए नाना पाटेकर अलग पहचान रखते थे। अपने लंबे करियर में उन्होंने कई तरह के किरदार निभाए और अभिनय के अलग-अलग रंग दिखाए।

‘प्रहार’ के लिए तीन साल ली आर्मी ट्रेनिंग

नाना पाटेकर अपने काम को लेकर कितने समर्पित थे, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि फिल्म ‘प्रहार’ के लिए उन्होंने तीन साल तक आर्मी ट्रेनिंग प्रोग्राम में हिस्सा लिया था। इस दौरान उन्हें कैप्टन की रैंक भी मिली थी।

साल 2007 में आई फिल्म ‘वेलकम’ में उन्होंने डॉन उदय शेट्टी का किरदार निभाया। इस भूमिका में नाना इस तरह रमे कि दर्शक उनकी अदाकारी के कायल हो गए। उनकी कॉमिक टाइमिंग भी जबरदस्त थी। चाहे एंग्री मैन का किरदार हो या कॉमेडी, नाना हर तरह की भूमिका में अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे।

नाना पाटेकर की आखिरी फिल्म ‘ओ रोमियो’ थी। इसके अलावा वह वेब सीरीज ‘संकल्प’ में भी नजर आए। उनके काम की लोगों ने हमेशा सराहना की।

पिता का डूबा बिजनेस, परिवार पर आया आर्थिक संकट

नाना पाटेकर का जन्म एक मराठी परिवार में हुआ था। उनके पिता टेक्सटाइल पेंटिंग का बिजनेस करते थे। लेकिन बिजनेस में धोखा मिलने के बाद परिवार को काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। हालात ऐसे हो गए थे कि परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना भी मुश्किल हो गया था।

घर के खर्च के लिए पैसे की कमी के बीच नाना को कम उम्र में ही परिवार की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। उन्होंने छोटी-मोटी नौकरियां करनी शुरू कर दीं और मुश्किल दौर में परिवार का सहारा बने।

35 रुपये में करते थे काम, पोस्टर्स भी पेंट किए

संघर्ष के दिनों में नाना पाटेकर ने कई तरह के काम किए। उन्होंने जेब्रा क्रॉसिंग और फिल्मों के पोस्टर्स तक पेंट किए। इसके अलावा वह पार्ट टाइम नौकरी भी करते थे, जिसके लिए उन्हें एक दिन के 35 रुपये मिलते थे।

आर्थिक तंगी के इस दौर में भी नाना ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा। शुरुआती संघर्षों के बाद धीरे-धीरे उन्हें काम मिलता गया और अपनी प्रतिभा के दम पर उन्होंने इंडस्ट्री में मजबूत पहचान बना ली।

खेती से भी था गहरा लगाव

अभिनय के अलावा नाना पाटेकर को खेती-बाड़ी का भी शौक था। वह अपने गोवा स्थित घर में खेती करते थे। किसानों के प्रति उनका लगाव भी किसी से छिपा नहीं था।

नाना महाराष्ट्र के किसानों की मदद के लिए हमेशा आगे रहते थे। गरीब किसानों के प्रति उनका जुड़ाव और उनके लिए काम करने की इच्छा उनके व्यक्तित्व का एक अहम हिस्सा रही।

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