Wednesday , 21 October 2026

देवघर में क्यों नहीं जलाया जाता रावण का पुतला? बाबा बैद्यनाथ धाम से जुड़ी है सदियों पुरानी धार्मिक मान्यता

झारखंड डेस्क: देशभर में विजयादशमी के मौके पर रावण दहन की परंपरा निभाई जाती है, लेकिन झारखंड के देवघर में रावण के पुतले नहीं जलाए जाते। बाबा बैद्यनाथ धाम की नगरी में इस परंपरा के पीछे भगवान शिव के प्रति रावण की अटूट भक्ति और ज्योतिर्लिंग की स्थापना से जुड़ी धार्मिक मान्यता बताई जाती है। यहां रावण को केवल बुराई के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि भगवान शिव के अनन्य भक्त के तौर पर भी याद किया जाता है।

रावण की शिवभक्ति से जुड़ी है मान्यता

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रावण भगवान शिव का परम भक्त था। कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न करने के बाद वह ज्योतिर्लिंग को कैलाश से लंका ले जाना चाहता था। हालांकि, दैवीय परिस्थितियों के कारण ज्योतिर्लिंग देवघर की धरती पर स्थापित हो गया। मान्यता है कि इसी घटना के चलते यहां बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई। बाबा बैद्यनाथ धाम देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल है।

कृतज्ञता की परंपरा से भी जुड़ा है रावण दहन न होना

बाबा बैद्यनाथ मंदिर के तीर्थ पुरोहित प्रभाकर शांडिल्य के अनुसार, देवघर में रावण के पुतले नहीं जलाने के पीछे किसी के उपकार को नहीं भूलने की भावना भी जुड़ी है। उन्होंने बताया कि भारतीय संस्कृति में कृतघ्नता को उचित नहीं माना गया है। यदि किसी शत्रु ने भी जाने-अनजाने कोई उपकार किया हो, तो उसके प्रति सम्मान का भाव रखना चाहिए।

तीर्थ पुरोहित के मुताबिक, रावण कैलाश से ज्योतिर्लिंग लेकर लंका जा रहा था। भगवान विष्णु की माया के कारण उसे ज्योतिर्लिंग देवघर की धरती पर रखना पड़ा और यहीं उसकी स्थापना हो गई। इस मान्यता के अनुसार, रावण बाबा बैद्यनाथ धाम की स्थापना का निमित्त बना। इसी वजह से देवघर में विजयादशमी पर रावण दहन की परंपरा नहीं निभाई जाती।

शक्तिपीठ के रूप में भी प्रसिद्ध है देवघर

बाबा बैद्यनाथ धाम ज्योतिर्लिंग के साथ-साथ शक्तिपीठ के रूप में भी प्रसिद्ध है। धार्मिक मान्यता है कि इसी स्थान पर माता सती का हृदय गिरा था। यही कारण है कि यहां भगवान शिव और माता शक्ति की पूजा विशेष श्रद्धा के साथ की जाती है।

बाबा बैद्यनाथ को कामनालिंग के रूप में पूजा जाता है

तीर्थ पुरोहित प्रभाकर शांडिल्य के अनुसार, बाबा बैद्यनाथ को कामनालिंग के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव ध्यानमग्न रहते हैं, जबकि माता सती सदैव जागृत रहती हैं और भक्तों की मनोकामनाओं से भगवान शिव को अवगत कराती हैं। धार्मिक परंपरा में बाबा को जलाभिषेक और माता को शृंगार तथा गठबंधन अर्पित करना विशेष महत्व रखता है।

इस तरह देवघर में रावण दहन नहीं करने की परंपरा को भगवान शिव के प्रति रावण की भक्ति, धार्मिक आस्था और कृतज्ञता की भावना से जोड़कर देखा जाता है।

 

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