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शादी के बाद भी दहेज मांगा तो होगी कार्रवाई! MP हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, मौखिक गवाही से भी साबित हो सकता है आरोप

 

नेशनल डेस्क: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने दहेज से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत कार्रवाई के लिए यह जरूरी नहीं है कि शादी से पहले ही दहेज की रकम तय की गई हो या कोई लिखित समझौता हुआ हो। विवाह के बाद दहेज की मांग किए जाने पर भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है। ऐसी मांग को साबित करने के लिए लिखित दस्तावेज के बजाय मौखिक गवाही को भी साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। इसी मामले में हाईकोर्ट ने पति के खिलाफ निचली अदालत की ओर से सुनाई गई सजा बहाल कर दी।

दहेज मांगने के लिए लिखित समझौता अनिवार्य नहीं

इंदौर बेंच में मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस आलोक अवस्थी ने कहा कि दहेज निषेध अधिनियम की धारा 4 के तहत कार्रवाई के लिए यह साबित करना जरूरी नहीं है कि विवाह से पहले ही दहेज की रकम निर्धारित कर दी गई थी। शादी के बाद दहेज मांगने का आरोप भी कानून के दायरे में आ सकता है।

अदालत के मुताबिक, दहेज की मांग साबित करने के लिए किसी लिखित दस्तावेज या समझौते का होना अनिवार्य नहीं है। गवाहों के बयान भी महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने उस अपीलीय फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें पति और उसके पिता को बरी कर दिया गया था।

17 लाख रुपये देने के बाद भी 25 लाख मांगने का आरोप

यह मामला एक महिला की शिकायत से जुड़ा है। महिला ने आरोप लगाया था कि उसके माता-पिता ने शादी के समय करीब 17 लाख रुपये नकद, गहने और घरेलू सामान दिया था। महिला के मुताबिक, उसके पति ने अमेरिका से बीबीए करने की बात कही थी, जबकि शिकायत में उसने दावा किया कि पति की पढ़ाई केवल 12वीं कक्षा तक हुई थी।

महिला ने आरोप लगाया कि शादी के बाद ससुराल पक्ष की ओर से कहा जाता था कि उन्हें दहेज में 25 लाख रुपये मिलने की उम्मीद थी, लेकिन उन्हें केवल 17 लाख रुपये ही मिले। शिकायत के अनुसार, शेष रकम नहीं देने पर उसे ससुराल से निकाल दिया गया।

इसके बाद महिला ने 6 अगस्त 2007 को शिकायत दर्ज कराई थी। मामले में दहेज की मांग और उससे जुड़े आरोपों को लेकर कानूनी कार्यवाही हुई।

नौ गवाहों के बयान बने मामले का अहम आधार

मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कुल नौ गवाह पेश किए। इनमें शिकायतकर्ता महिला, उसके माता-पिता, भाई, जांच अधिकारी और अन्य गवाह शामिल थे।

निचली अदालत ने मामले में पति और उसके पिता को दोषी ठहराते हुए एक-एक साल के कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि, दोनों ने इस फैसले को अपीलीय अदालत में चुनौती दी, जहां से उन्हें राहत मिल गई और दोनों को बरी कर दिया गया।

इसके बाद महिला ने हाईकोर्ट का रुख किया। मामले की समीक्षा के बाद हाईकोर्ट ने पति के खिलाफ निचली अदालत की दोषसिद्धि और सजा बहाल कर दी। फैसले में मौखिक गवाही के महत्व और दहेज की मांग के लिए पहले से लिखित समझौता होने की अनिवार्यता न होने के पहलू को अहम माना गया।

पिता की मृत्यु के कारण उनके खिलाफ सजा बहाल नहीं हुई

हाईकोर्ट ने पति के खिलाफ निचली अदालत का फैसला बहाल किया, लेकिन उसके पिता के मामले में ऐसा नहीं किया। इसकी वजह पिता की मृत्यु थी।

इस मामले में अदालत के फैसले का प्रमुख पहलू यह है कि दहेज की मांग पर कार्रवाई के लिए शादी से पहले रकम तय होना या लिखित समझौता होना अनिवार्य नहीं है। शादी के बाद की गई दहेज की मांग भी कानूनी कार्रवाई का आधार बन सकती है। ऐसी मांग को साबित करने के लिए मौखिक गवाही भी साक्ष्य के रूप में महत्वपूर्ण हो सकती है।

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