Monday , 5 October 2026

UBT में बगावत का बड़ा खतरा! उद्धव की सियासी ढाल बने दो रणनीतिकार, दिल्ली से चली ऐसी चाल कि बढ़ी शिंदे गुट की मुश्किलें

नेशनल डेस्क : महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। शिवसेना (यूबीटी) के भीतर संभावित बगावत की चर्चाओं के बीच पार्टी नेतृत्व पूरी तरह सतर्क मोड में नजर आ रहा है। सूत्रों के अनुसार, उद्धव ठाकरे के लोकसभा सांसदों में टूट की आशंकाओं ने मातोश्री की चिंता बढ़ा दी है। इसी बीच पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय राउत और अनिल देसाई सक्रिय भूमिका में सामने आए हैं और दिल्ली में डेरा डालकर राजनीतिक व कानूनी स्तर पर मोर्चा संभाल लिया है।

बताया जा रहा है कि उद्धव ठाकरे खेमे के कुल नौ सांसदों में से छह सांसदों के एकनाथ शिंदे गुट के साथ जाने की अटकलों ने सियासी तापमान बढ़ा दिया है। इस संभावित संकट को देखते हुए पार्टी नेतृत्व अब हर स्तर पर नुकसान को रोकने की रणनीति पर काम कर रहा है।

दिल्ली में शुरू हुआ डैमेज कंट्रोल अभियान

शिवसेना में पहले हुए बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के बाद सत्ता और संगठन दोनों पर नियंत्रण खो चुके उद्धव ठाकरे के सामने अब सांसदों की एकजुटता बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है। इसी पृष्ठभूमि में संजय राउत और अनिल देसाई दिल्ली पहुंचे हैं।

पार्टी के भीतर उन्हें संकट के समय सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार माना जाता है। जहां संजय राउत अपने आक्रामक राजनीतिक रुख और बयानबाजी के लिए जाने जाते हैं, वहीं अनिल देसाई कानूनी और संगठनात्मक रणनीति तैयार करने में अहम भूमिका निभाते हैं। माना जा रहा है कि दिल्ली दौरे का उद्देश्य कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेकर संभावित राजनीतिक चुनौतियों का जवाब तैयार करना है।

15-15 करोड़ के ऑफर का आरोप, राउत का बड़ा दावा

दिल्ली पहुंचने से पहले संजय राउत ने विपक्षी खेमे पर गंभीर आरोप लगाते हुए राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी। उन्होंने दावा किया कि शिवसेना (यूबीटी) के सांसदों को पाला बदलने के लिए 15-15 करोड़ रुपये तक का प्रस्ताव दिया जा रहा है।

राउत ने इस कथित कोशिश को चौंकाने वाला और बेहद आपत्तिजनक बताया। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल और गर्म हो गया। इसी दौरान सांसद राजाभाऊ वाजे ने भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया कि वह उद्धव ठाकरे के साथ हैं और किसी अन्य खेमे में शामिल होने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने बताया कि वह केवल संसदीय समिति की बैठक में भाग लेने के लिए दिल्ली आ रहे हैं।

राउत ने यह भी कहा कि दबाव और प्रलोभन की राजनीति के बावजूद उनके सांसद पार्टी के साथ मजबूती से खड़े रहेंगे।

दो-तिहाई संख्या का गणित बना सबसे बड़ा मुद्दा

पूरे घटनाक्रम के केंद्र में संख्या बल का सवाल है। दल-बदल कानून के तहत किसी भी बागी गुट को अयोग्यता से बचने के लिए दो-तिहाई समर्थन जुटाना जरूरी होता है। इसी कारण छह सांसदों के आंकड़े को बेहद अहम माना जा रहा है।

हाल ही में हुई एक बैठक में पांच सांसदों की अनुपस्थिति ने अटकलों को हवा दी थी। हालांकि जिन सांसदों के नाम संभावित टूट से जोड़कर देखे जा रहे थे, उन्होंने सार्वजनिक रूप से ऐसे किसी कदम से इनकार कर दिया है।

पार्टी सूत्रों का मानना है कि यदि पर्याप्त संख्या में सांसद उद्धव ठाकरे के साथ मजबूती से बने रहते हैं तो कथित ‘ऑपरेशन टाइगर’ को सफल बनाना आसान नहीं होगा। यही वजह है कि पार्टी नेतृत्व लगातार अपने सांसदों के संपर्क में बना हुआ है।

लोकसभा अध्यक्ष को भेजा गया अहम पत्र

राजनीतिक बयानबाजी के समानांतर पार्टी ने कानूनी मोर्चे पर भी सक्रियता बढ़ा दी है। शिवसेना (यूबीटी) की ओर से लोकसभा अध्यक्ष को एक आधिकारिक पत्र भेजा गया है।

इस पत्र में संसद के भीतर केवल शिवसेना (यूबीटी) को अधिकृत राजनीतिक दल के रूप में मान्यता देने की मांग की गई है। साथ ही यह भी कहा गया है कि किसी अन्य गुट से जुड़े किसी दावे पर निर्णय लेने से पहले पार्टी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाए।

इस कदम को संभावित राजनीतिक और संसदीय विवादों के बीच एक महत्वपूर्ण कानूनी तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।

महाराष्ट्र की राजनीति में बढ़ी हलचल

वर्तमान हालात में उद्धव ठाकरे के सामने यह सिर्फ संगठन बचाने की नहीं, बल्कि राजनीतिक साख बनाए रखने की भी चुनौती मानी जा रही है। एक तरफ संजय राउत लगातार आक्रामक रुख अपनाकर पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अनिल देसाई कानूनी रणनीति के जरिए संभावित संकट को टालने की कवायद में जुटे हैं।

महाराष्ट्र की राजनीति इस समय बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रही है, जहां हर नए घटनाक्रम के साथ समीकरण बदलते दिखाई दे रहे हैं। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि दिल्ली में शुरू हुआ यह सियासी और कानूनी अभियान उद्धव ठाकरे खेमे को राहत दिला पाता है या नहीं।

 

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