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बिहार का अनोखा झिझिया नृत्य: काले जादू और बुरी नजर से बचाव की मान्यता से जुड़ी है सदियों पुरानी परंपरा

लाइफस्टाइल डेस्क: बिहार की लोकसंस्कृति में कई ऐसी परंपराएं हैं, जिनमें कला के साथ आस्था और मान्यताओं का गहरा संबंध देखने को मिलता है। इन्हीं में से एक है मिथिला क्षेत्र का प्रसिद्ध लोकनृत्य झिझिया। यह नृत्य खासतौर पर नवरात्र के दौरान किया जाता है और इसे मां भगवती की आराधना से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि झिझिया के जरिए महिलाएं अपने परिवार और बच्चों को बुरी नजर, टोने-टोटके और नकारात्मक शक्तियों से बचाने की कामना करती हैं।

दीये से सजे मटके से बना झिझिया का नाम

झिझिया शब्द मैथिली के ‘झिझ’ शब्द से बना माना जाता है, जिसका अर्थ रोशनी या दीपक से जुड़ा है। इस नृत्य में महिलाएं सिर पर छेद वाले मिट्टी के घड़े में जलता हुआ दीपक रखकर नृत्य करती हैं। इसी वजह से इसे झिझिया नाम मिला।

यह सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि बिहार की लोक आस्था और धार्मिक विश्वासों से जुड़ी परंपरा है।

बुरी शक्तियों से रक्षा की मान्यता से जुड़ी कहानी

लोक मान्यताओं के अनुसार, पुराने समय में मिथिलांचल क्षेत्र में नवरात्र के दिनों में टोने-टोटके, डायन और काले जादू जैसी नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बढ़ने की मान्यता थी। ऐसे में परिवार और गांव को इनसे बचाने के लिए महिलाओं ने ब्रह्म बाबा और देवी भगवती की पूजा के रूप में झिझिया नृत्य की शुरुआत की।

समय के साथ यह परंपरा लोकगीतों और पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही संस्कृति का हिस्सा बन गई।

मिट्टी का घड़ा और दीपक का धार्मिक महत्व

झिझिया में इस्तेमाल होने वाला मिट्टी का घड़ा कई छेदों वाला होता है। लोक मान्यता के अनुसार, यह घड़ा पूरे ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है, जबकि उसके अंदर रखा दीपक मां दुर्गा की शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

ऐसा विश्वास है कि दीपक से निकलने वाली रोशनी नकारात्मक शक्तियों को दूर करती है और परिवार की रक्षा करती है।

गोल घेरे में किया जाता है झिझिया नृत्य

झिझिया नृत्य के दौरान महिलाएं सिर पर दीपक रखा हुआ मटका संतुलित करती हैं और गोलाकार में नृत्य करती हैं। ढोलक और हार्मोनियम की धुन पर महिलाओं का समूह ताल मिलाकर पारंपरिक गीत गाता है और कदमों के साथ नृत्य करता है।

इस दौरान मटके को संतुलित रखना भी इस लोकनृत्य की खास पहचान है।

ब्रह्म बाबा और देवी भगवती की आराधना वाले गीत

झिझिया नृत्य पारंपरिक लोकगीतों के साथ किया जाता है। इन गीतों में महिलाएं अपने ईष्टदेव ब्रह्म बाबा और देवी भगवती से परिवार की सुरक्षा और बुरी नजर से बचाव की प्रार्थना करती हैं। ढोलक और हार्मोनियम की धुन के साथ गाए जाने वाले ये गीत इस लोक परंपरा को और खास बना देते हैं।

पारंपरिक पहनावे से बढ़ती है झिझिया की सुंदरता

झिझिया नृत्य के दौरान महिलाएं आमतौर पर लाल, पीले जैसे चमकीले रंगों की साड़ियां पहनती हैं। मैथिली शैली में साड़ी का पल्ला पहनने के साथ पारंपरिक आभूषण भी धारण किए जाते हैं। मांग टीका, हंसुली, चूड़ियां, पायल, कमरबंध और नथ जैसे गहने इस लोकनृत्य की पारंपरिक पहचान का हिस्सा हैं।

 

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