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लाल किले पर पहली बार गूंजा 150 साल पुराना ‘वंदे मातरम्’, लता मंगेशकर से जुड़ी है खास कहानी

नेशनल डेस्क: स्वतंत्रता दिवस 2026 का समारोह इस बार ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने के कारण भी खास रहा। दिल्ली के लाल किले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तिरंगा फहराया और स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान पहली बार इस ऐतिहासिक अवसर पर 150 साल पुराने ‘वंदे मातरम्’ की प्रस्तुति हुई। यह गीत लंबे समय से भारत के स्वतंत्रता आंदोलन, देशभक्ति और राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा रहा है।

जिस दौर में ‘वंदे मातरम्’ की रचना हुई, उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। देश की आजादी में अभी कई दशक बाकी थे, लेकिन इस गीत ने धीरे-धीरे लोगों के भीतर राष्ट्रप्रेम और स्वतंत्रता की भावना को मजबूत करने का काम किया। इसकी यात्रा स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर सिनेमा और आज के राष्ट्रीय आयोजनों तक जारी रही है।

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी रचना

‘वंदे मातरम्’ की रचना 19वीं सदी में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। बाद में उन्होंने इसे अपने चर्चित उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया। उस समय देश अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहा था और स्वतंत्रता की भावना लोगों के बीच तेजी से मजबूत हो रही थी।

ऐसे माहौल में ‘वंदे मातरम्’ लोगों के लिए केवल एक गीत नहीं रहा। भारत माता के प्रति समर्पण और देश के लिए कुछ कर गुजरने की भावना को व्यक्त करने वाला यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों के बीच प्रेरणा का स्रोत बन गया। देखते ही देखते यह गीत आंदोलन की पहचान का हिस्सा बन गया और लोगों की जुबान पर चढ़ गया।

1896 में पहली बार सार्वजनिक मंच पर गाया गया

‘वंदे मातरम्’ को पहली बार सार्वजनिक मंच पर 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने गाया था। इसके बाद यह गीत देश के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचा और स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई।

आजादी से पहले ही ‘वंदे मातरम्’ भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन की एक प्रमुख पहचान बन चुका था। स्वतंत्रता मिलने के बाद भी इसके प्रति लोगों का जुड़ाव और इसकी लोकप्रियता कायम रही।

1952 की फिल्म ‘आनंदमठ’ में पहुंचा बड़े पर्दे पर

सिनेमा ने भी ‘वंदे मातरम्’ को देशभर के लोगों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1952 में रिलीज हुई फिल्म ‘आनंदमठ’ में इसे बड़े पर्दे पर प्रस्तुत किया गया। फिल्म में इस गीत को लता मंगेशकर और हेमंत कुमार ने अपनी आवाज दी।

लता मंगेशकर की आवाज में रिकॉर्ड किए गए ‘वंदे मातरम्’ को खास पहचान मिली। उनकी सुरीली आवाज ने इस गीत को आने वाली कई पीढ़ियों तक पहुंचाया और यह देशभक्ति के गीतों में अपनी खास जगह बनाने में सफल रहा।

फिल्म ‘आनंदमठ’ में भारत भूषण, पृथ्वीराज कपूर, प्रदीप कुमार और गीता बाली जैसे कलाकारों ने अभिनय किया था। फिल्म के जरिए ‘वंदे मातरम्’ की पहुंच बड़े स्तर पर दर्शकों तक हुई।

कई फिल्मों में अलग-अलग अंदाज में सुनाई दी गूंज

समय के साथ ‘वंदे मातरम्’ भारतीय सिनेमा का भी अहम हिस्सा बन गया। अलग-अलग दौर में फिल्मकारों ने इसे अपनी फिल्मों में अलग अंदाज और संगीत के साथ पेश किया। ‘वंदे मातरम्’ (1985), ‘कभी खुशी कभी गम’ (2001), ‘रोमियो अकबर वॉल्टर’ (2019) और ‘फाइटर’ (2024) जैसी फिल्मों में भी इसकी गूंज सुनाई दी।

प्रस्तुति और संगीत का अंदाज बदलता रहा, लेकिन गीत का मूल भाव देश के प्रति प्रेम और समर्पण ही रहा। यही वजह है कि अलग-अलग पीढ़ियों के बीच भी ‘वंदे मातरम्’ की पहचान और भावनात्मक जुड़ाव बना रहा।

150 साल बाद भी क्यों कायम है ‘वंदे मातरम्’ का असर?

आज संगीत सुनने के तौर-तरीके बदल चुके हैं। मोबाइल, सोशल मीडिया और ओटीटी के दौर में मनोरंजन के माध्यम भी पहले से काफी अलग हैं। इसके बावजूद ‘वंदे मातरम्’ का प्रभाव कम नहीं हुआ है। स्कूलों, राष्ट्रीय पर्वों, बड़े सार्वजनिक आयोजनों और फिल्मों में इसकी प्रस्तुति आज भी देशभक्ति का माहौल पैदा करती है।

करीब 150 वर्षों की यात्रा के बाद भी ‘वंदे मातरम्’ केवल इतिहास का हिस्सा बनकर नहीं रह गया है। यह आज भी करोड़ों भारतीयों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है। स्वतंत्रता दिवस 2026 पर लाल किले के ऐतिहासिक मंच से इसकी पहली प्रस्तुति इस लंबे सफर में एक और महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में सामने आई।

 

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