Friday , 9 October 2026

राहुल गांधी की ‘गुरिल्ला पॉलिटिक्स’ क्यों हो रही चर्चा में? अचानक धरना, थाने की ओर कूच और बिना बताए पहुंचने की रणनीति

नेशनल डेस्क: कभी अचानक धरना, कभी पुलिस थाने की ओर कूच और कभी बिना किसी पूर्व सूचना के किसी जगह पहुंच जाना—कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की राजनीति में ‘सरप्राइज’ अब एक रणनीति का हिस्सा बनता दिख रहा है. मोदी सरकार को घेरने के लिए उनके इन तौर-तरीकों को ‘गुरिल्ला पॉलिटिक्स’ के तौर पर चर्चा मिल रही है. इसमें औचक कार्रवाई, अचानक विरोध प्रदर्शन और छोटे समूह के साथ राजनीतिक संदेश देने की कोशिश शामिल है.

औचक एक्शन और छोटे समूह में विरोध

राहुल गांधी लगातार सरकार को घेरने के लिए ऐसी रणनीति अपनाते नजर आ रहे हैं, जिसमें पहले से बहुत ज्यादा जानकारी बाहर नहीं आने दी जाती. कभी वह अचानक धरने पर बैठते हैं, कभी पुलिस थाने की ओर बढ़ते हैं और कभी अचानक किसी जगह पहुंच जाते हैं.

इन कार्रवाइयों में बड़ी भीड़ के बजाय कई बार वह अकेले या छोटे से समूह के साथ नजर आते हैं. इस रणनीति का मकसद यही दिखता है कि कार्रवाई अचानक हो और उसके बारे में पहले से कानों-कान खबर न हो. हालांकि, राहुल गांधी के लिए यह तरीका बिल्कुल नया नहीं है. इसकी झलक काफी पहले भट्टा-पारसौल में भी दिखाई दी थी, जब वह बाइक पर सवार होकर किसानों से मिलने पश्चिमी उत्तर प्रदेश पहुंच गए थे.

पुराना तरीका, लेकिन अब ज्यादा आक्रामक अंदाज

पिछले कुछ वर्षों में राहुल गांधी की इस रणनीति में तेजी दिखाई दी है. वह पहले भी कह चुके हैं कि विरोधियों को ‘न्यूट्रल’ करने के लिए उनकी कमजोरियों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए. राहुल गांधी को इस सोच की प्रेरणा अपने मार्शल आर्ट्स के अभ्यास से मिली है. वह मार्शल आर्ट्स की कई विधाओं का अभ्यास करते रहे हैं. भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भी दिनभर चलने के बाद वह शाम को भारत यात्रियों के मार्शल आर्ट्स प्रशिक्षण सत्र लेते थे.

धरना पॉलिटिक्स के लिए फिटनेस पर जोर

धरना और सड़क पर उतरकर विरोध करने वाली राजनीति के लिए भी काफी ऊर्जा की जरूरत होती है. राहुल गांधी एक रील में खुद बता चुके हैं कि व्यस्तताओं के बावजूद वह शारीरिक फिटनेस को बेहद जरूरी मानते हैं और रोज करीब एक घंटे कसरत करते हैं.

राहुल गांधी इन बातों को पहले भी कहते रहे हैं, लेकिन कुछ साल पहले उनके इन बयानों और तौर-तरीकों के मायने अलग थे. अब इन्हें ज्यादा करीब से देखा जा रहा है. खास तौर पर तब, जब कांग्रेस उनकी इस छवि को जमीनी राजनीति और धरना-प्रदर्शन की राजनीति में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रही है.

‘अड़ियल’ तेवर या सोची-समझी सियासी रणनीति?

हाल के दिनों में राहुल गांधी लगातार आक्रामक तरीके से सरकार को घेरते दिखाई दे रहे हैं. प्रधानमंत्री आवास की ओर बढ़ते हुए धरने पर बैठना हो या संसद मार्ग पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज किए जाने की अनुमति मिलने तक वहीं डटे रहना, उनके कदमों में टकराव का राजनीतिक संदेश साफ दिखाई देता है.

धरना पॉलिटिक्स में राहुल गांधी का यह अड़ियल रवैया उनके राजनीतिक वार को और आक्रामक बनाता नजर आ रहा है. राहुल गांधी के करीबी लोगों का मानना है कि वह सही और गलत का फैसला केवल सियासी नफा-नुकसान के आधार पर नहीं करते. कई मौकों पर उन्होंने ऐसे फैसले भी लिए हैं जिनका खामियाजा उन्हें उठाना पड़ा, लेकिन उनके साथ काम करने वाले कहते हैं कि वह जो सोचते हैं, वही करते हैं.

‘ब्रैंड मोदी’ के सामने ‘एंटी-मोदी’ ब्रैंड बनाने की कोशिश?

राहुल गांधी के सामने राजनीतिक चुनौती बड़ी है. एक ओर ‘ब्रैंड मोदी’ की मजबूत और स्थापित राजनीतिक विरासत है, तो दूसरी ओर राहुल गांधी के व्यक्तित्व को उससे बिल्कुल अलग राजनीतिक ब्रैंड के रूप में पेश करने की कोशिश दिखाई दे रही है.

एक तरफ नियंत्रित और स्थापित सत्ता की राजनीति है, तो दूसरी तरफ अचानक कार्रवाई, सड़क पर उतरने और टकराव मोल लेने वाली राजनीति. कांग्रेस की राजनीति में राहुल गांधी की यह छवि सरकार के सामने एक अलग राजनीतिक ब्रैंड के तौर पर उभरती दिखाई दे रही है. अब आने वाले सियासी रण में जनता किस तरह की राजनीति को ज्यादा पसंद करती है, इसका फैसला राजनीतिक मैदान में होना है.

 

Check Also

India Mobile Congress 2026: देश के कोने-कोने तक पहुंचा 5G, PM मोदी बोले- पहले डिजिटल डिवाइड थी चुनौती; अब 6G और AI की बारी

टेक डेस्क: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 अक्टूबर को नई दिल्ली के यशोभूमि में इंडिया …