नेशनल डेस्क : भारत और रूस की साझेदारी में विकसित ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ने वैश्विक रक्षा क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना ली है। जिस तकनीक के लिए कभी भारत को विदेशी देशों पर निर्भर रहना पड़ता था, आज उसी भारत की विकसित मिसाइल प्रणाली को रूस जैसे सैन्य महाशक्ति देश अपनी सेना में शामिल करने की तैयारी कर रहा है। यह घटनाक्रम भारत की बढ़ती सामरिक क्षमता और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
ब्रह्मोस एयरोस्पेस के प्रमुख डॉ. जयतीर्थ आर. जोशी ने नागपुर में आयोजित एक रक्षा कार्यक्रम के दौरान संकेत दिए हैं कि रूस अपनी सैन्य ताकत में ब्रह्मोस मिसाइल को शामिल करने का इच्छुक है। उन्होंने बताया कि इस संबंध में दोनों देशों के बीच बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है और निकट भविष्य में भारत रूस को ब्रह्मोस प्रणाली की आपूर्ति शुरू कर सकता है।
भारत के लिए यह केवल एक रक्षा सौदा नहीं, बल्कि वैश्विक रणनीतिक परिदृश्य में बढ़ते प्रभाव का संकेत है। फिलीपींस को सफल निर्यात के बाद अब रूस का संभावित ग्राहक के रूप में सामने आना भारतीय रक्षा उद्योग के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
ऑपरेशन सिंदूर में दिखी ब्रह्मोस की असली ताकत
मई 2025 में भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर में पहली बार ब्रह्मोस मिसाइल का इस्तेमाल वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों में किया गया। इस अभियान में भारतीय वायुसेना और थलसेना ने सीमा पार मौजूद आतंकी ठिकानों और रणनीतिक लक्ष्यों को निशाना बनाया।
सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों से दागी गई एयर-लॉन्च ब्रह्मोस मिसाइलों ने दुश्मन के ठिकानों पर अत्यंत सटीक हमले किए। अपनी तेज रफ्तार और रडार से बच निकलने की क्षमता के कारण यह मिसाइल विरोधी वायु रक्षा प्रणालियों को चकमा देने में सफल रही। इसके प्रदर्शन ने अंतरराष्ट्रीय सैन्य विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित किया और रूस ने भी इसकी क्षमता को करीब से देखा।
रूस के लिए क्यों अहम बन गई ब्रह्मोस?
ब्रह्मोस का विकास भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन और रूस की साझेदार संस्था के संयुक्त प्रयासों से हुआ था। लंबे समय तक इसका प्रमुख उपयोगकर्ता भारत रहा, लेकिन अब रूस की दिलचस्पी कई रणनीतिक कारणों से बढ़ी है।
युद्ध परिस्थितियों में साबित कर चुकी है क्षमता
हाल के वर्षों में वैश्विक संघर्षों और सुरक्षा चुनौतियों के बीच रूस ऐसी मिसाइल प्रणालियों की तलाश में है जो वास्तविक परिस्थितियों में अपनी प्रभावशीलता साबित कर चुकी हों। भारतीय सेना के तीनों अंगों में सफल तैनाती और ऑपरेशन सिंदूर में प्रदर्शन ने ब्रह्मोस को एक भरोसेमंद प्रणाली के रूप में स्थापित किया है।
बेहद तेज रफ्तार और सटीक निशाना
ब्रह्मोस की सबसे बड़ी ताकत इसकी सुपरसोनिक गति है। ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना तेज उड़ान भरने वाली यह दुनिया की सबसे तेज परिचालन क्रूज मिसाइलों में शामिल है। कम ऊंचाई पर उड़ान भरने की क्षमता इसे रडार की पकड़ से काफी हद तक दूर रखती है, जिससे दुश्मन को प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत कम समय मिलता है।
स्वदेशीकरण से लागत में आई कमी
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने ब्रह्मोस परियोजना में व्यापक स्वदेशीकरण किया है। मिसाइल के कई महत्वपूर्ण हिस्से अब देश में ही तैयार किए जा रहे हैं, जिससे उत्पादन लागत में कमी आई है। ऐसे में रूस के लिए भारत से तैयार मिसाइल प्रणाली प्राप्त करना आर्थिक और रणनीतिक दोनों दृष्टियों से लाभकारी माना जा रहा है।
फिलीपींस के बाद रूस, भारत के रक्षा निर्यात को मिलेगी नई ऊंचाई
वर्ष 2022 में फिलीपींस ने लगभग 3,100 करोड़ रुपये के सौदे के साथ ब्रह्मोस खरीदने वाला पहला विदेशी देश बनकर इतिहास रचा था। इस समझौते के तहत मिसाइलों की आपूर्ति भी शुरू हो चुकी है।
इसके अलावा दक्षिण-पूर्व एशिया के कई अन्य देशों के साथ भी निर्यात संबंधी बातचीत आगे बढ़ रही है। ऐसे समय में रूस का संभावित ग्राहक के रूप में सामने आना भारत के रक्षा निर्यात क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है।
ब्रह्मोस-II और नए संस्करणों को भी मिलेगा बढ़ावा
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रूस ब्रह्मोस को अपनी सेना में शामिल करता है तो दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग और मजबूत होगा। इससे भविष्य की हाइपरसोनिक मिसाइल ब्रह्मोस-II और छोटे आकार वाले ब्रह्मोस-एनजी जैसे उन्नत संस्करणों के विकास को भी नई गति मिलने की संभावना है।
Navyug Samachar