Saturday , 15 August 2026

पति की सैलरी का 25% गुजारा भत्ता देना जरूरी नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ किया नियम

उत्तर प्रदेश डेस्क: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ते को लेकर अहम टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पति की शुद्ध मासिक आय का 25 प्रतिशत गुजारा भत्ता देना कोई अनिवार्य नियम नहीं है, बल्कि यह केवल एक सामान्य दिशा-निर्देश है। हर मामले में पति-पत्नी की परिस्थितियों और तथ्यों को ध्यान में रखते हुए भत्ते की राशि तय की जाएगी।

जस्टिस अचल सचदेव की एकल पीठ ने यह टिप्पणी दो आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने कहा कि गुजारा भत्ते की राशि तय करने के लिए किसी एक तय प्रतिशत को आधार नहीं बनाया जा सकता।

गुजारा भत्ते की राशि परिस्थितियों के आधार पर होगी तय

हाईकोर्ट ने कहा कि पति की नेट इनकम का 25 प्रतिशत गुजारा भत्ता तय करने की बात केवल एक सामान्य गाइडलाइन है। निचली अदालतें मामले की स्थिति, पति की आय, पत्नी की जरूरतों और अन्य परिस्थितियों को देखते हुए इससे कम या ज्यादा राशि निर्धारित कर सकती हैं।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गुजारा भत्ते की गणना पति की शुद्ध आय के आधार पर होगी। शुद्ध आय का मतलब टैक्स और जरूरी कटौतियों के बाद बची हुई राशि है, न कि कुल वेतन।

पत्नी ने भत्ता बढ़ाने के लिए दाखिल की थी याचिका

इस मामले में पत्नी पिंकी उर्फ प्रीति ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कानपुर देहात की परिवार अदालत द्वारा तय 12 हजार रुपये मासिक गुजारा भत्ते को बढ़ाने की मांग की थी।

वहीं, दूसरी याचिका पति जय प्रकाश की ओर से दाखिल की गई थी, जिसमें परिवार अदालत के आदेश को चुनौती दी गई थी।

तलाक के बाद भी पत्नी का अधिकार खत्म नहीं होता

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि केवल तलाक हो जाने से पत्नी का गुजारा भत्ता पाने का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। अगर पत्नी खुद अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है, उसने दोबारा शादी नहीं की है और वह व्यभिचार में शामिल नहीं है, तो वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार बनी रह सकती है।

अदालत ने कहा कि गुजारा भत्ते का उद्देश्य पत्नी को सम्मानजनक जीवन जीने में सहायता देना है।

पति की आय 67 हजार रुपये से अधिक, भत्ता बढ़ाकर किया गया 20 हजार

हाईकोर्ट ने सुनवाई में पाया कि पत्नी के पास पर्याप्त आय का कोई साधन नहीं है, जबकि पति की आर्थिक स्थिति बेहतर है। अदालत के अनुसार पति की शुद्ध मासिक आय 67,043 रुपये थी।

परिवार अदालत ने सभी पहलुओं पर पर्याप्त विचार किए बिना 12 हजार रुपये मासिक गुजारा भत्ता तय किया था। इसके बाद हाईकोर्ट ने 10 जुलाई को दिए फैसले में गुजारा भत्ते की राशि बढ़ाकर 20 हजार रुपये प्रतिमाह कर दी।

 

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