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संभल हिंसा पर न्यायिक आयोग की बड़ी रिपोर्ट: सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क समेत कई नामों का जिक्र, बोला- पहले से रची गई थी पूरी साजिश

नेशनल डेस्क: उत्तर प्रदेश के संभल में 24 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा को लेकर गठित न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट बुधवार को विधानसभा में पेश कर दी गई। आयोग ने अपनी जांच में कहा है कि यह हिंसा अचानक नहीं भड़की थी, बल्कि इसके पीछे पहले से रची गई साजिश थी। रिपोर्ट के अनुसार सर्वे को लेकर मुस्लिम समुदाय के बीच भ्रामक प्रचार किया गया, बड़ी संख्या में लोगों को पहले से एकत्र किया गया और हालात को जानबूझकर हिंसक दिशा में ले जाया गया।

रिपोर्ट में कई प्रमुख लोगों की भूमिका का उल्लेख

न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में समाजवादी पार्टी के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल, शाही जामा मस्जिद इंतेजामिया कमेटी के अध्यक्ष एडवोकेट जफर अली, उपाध्यक्ष लद्दन खान, सचिव मशहूद अली फारुकी, एडवोकेट कासिम जमाल और मस्जिद प्रबंधन समिति के अन्य सदस्यों की भूमिका का उल्लेख किया गया है।

हालांकि आयोग की रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि पुलिस जांच के दौरान साक्ष्यों के अभाव में सुहेल इकबाल को पहले ही क्लीन चिट मिल चुकी है।

पूर्व हाई कोर्ट न्यायाधीश की अध्यक्षता में हुई थी जांच

संभल हिंसा की जांच के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश देवेंद्र कुमार अरोड़ा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय न्यायिक आयोग का गठन किया गया था। आयोग में पूर्व आईएएस अमित मोहन प्रसाद और पूर्व डीजीपी ए.के. जैन सदस्य रहे। विस्तृत जांच के बाद आयोग ने अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी थी, जिसे अब विधानसभा में प्रस्तुत किया गया है।

सर्वे रोकने के लिए पहले से जुटाई गई थी भीड़

आयोग के मुताबिक जामा मस्जिद के सर्वे को रोकने के उद्देश्य से पहले से लोगों को बुलाया गया था। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह अफवाह फैलाई गई कि मस्जिद को नुकसान पहुंचाया जाएगा। इसी प्रचार के बाद बड़ी संख्या में लोग मौके पर पहुंचे, जिससे माहौल तनावपूर्ण हो गया।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भड़काऊ भाषणों और नारेबाजी ने भीड़ को और उग्र बना दिया, जिसके बाद हालात पूरी तरह नियंत्रण से बाहर हो गए।

हथियार, पत्थर और हमलावर सामग्री के साथ पहुंचे थे उपद्रवी

आयोग की जांच के अनुसार हिंसा में शामिल लोग केवल विरोध प्रदर्शन के लिए नहीं आए थे, बल्कि वे हथियार, पत्थर और अन्य हमलावर सामग्री भी साथ लेकर पहुंचे थे। रिपोर्ट के मुताबिक भीड़ ने पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों पर पथराव किया, गोलीबारी की और आगजनी की घटनाओं को अंजाम दिया।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि उपद्रवियों ने पुलिस के हथियार और सरकारी सामान लूटने का भी प्रयास किया था।

चार लोगों की मौत पुलिस की गोली से नहीं हुई

न्यायिक आयोग की रिपोर्ट के अनुसार हिंसा में जान गंवाने वाले चार लोगों की मौत पुलिस की गोली से नहीं हुई थी। जांच के दौरान घटनास्थल से 12 बोर के कारतूस भी मिलने का उल्लेख किया गया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंसा के दौरान 28 पुलिसकर्मी घायल हुए थे, जिनमें सात पुलिसकर्मियों को गोली लगी थी।

राजनीतिक वर्चस्व और भ्रामक प्रचार का भी जिक्र

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मुकदमा संख्या 182/2024 के तथ्यों को छिपाकर यह प्रचार किया गया कि हिंदू समुदाय मस्जिद को गिराना चाहता है। रिपोर्ट के अनुसार इस तरह के भ्रामक प्रचार के जरिए लोगों को उकसाया गया।

आयोग ने यह भी दावा किया है कि जिया-उर-रहमान बर्क और सुहेल इकबाल राजनीतिक वर्चस्व बनाए रखने तथा सरकार और पुलिस की छवि खराब करने के उद्देश्य से लोगों को उकसाना चाहते थे। साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिले में मुस्लिम समुदाय के तुर्क और पठान गुटों के बीच वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा ने भी तनाव बढ़ाने में भूमिका निभाई।

कानून-व्यवस्था मजबूत करने की सिफारिश

भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए आयोग ने कानून-व्यवस्था को और प्रभावी बनाने, प्रशासनिक तंत्र को मजबूत करने तथा विभिन्न समुदायों के बीच विश्वास और सामाजिक सौहार्द बढ़ाने की सिफारिश की है। इसके साथ ही कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाले लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की अनुशंसा भी की गई है।

रिपोर्ट में दर्ज सभी आरोप न्यायिक जांच आयोग के निष्कर्षों और विधानसभा में प्रस्तुत दस्तावेज पर आधारित हैं। मामले से जुड़े व्यक्तियों के कानूनी अधिकार सुरक्षित हैं और इससे संबंधित आगे की न्यायिक प्रक्रिया स्वतंत्र रूप से जारी रह सकती है।

 

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