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किचन का स्पंज बन रहा माइक्रोप्लास्टिक का स्रोत! बर्तन धोते समय निकल रहे लाखों सूक्ष्म कण, स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा

हेल्थ डेस्क : घरों में बर्तन साफ करने के लिए इस्तेमाल होने वाला साधारण किचन स्पंज अब वैज्ञानिकों की चिंता का विषय बन गया है। एक नए अध्ययन में सामने आया है कि रोजाना उपयोग किए जाने वाले स्पंज से लगातार माइक्रोप्लास्टिक के बेहद छोटे कण निकलते हैं, जो पानी के साथ पर्यावरण में पहुंच जाते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये सूक्ष्म प्लास्टिक कण मानव शरीर में भी प्रवेश कर सकते हैं, जिससे स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ने की आशंका है।

तीन प्रकार के किचन स्पंज पर हुआ शोध

जर्मनी की यूनिवर्सिटी ऑफ बॉन के वैज्ञानिकों ने इस अध्ययन में तीन अलग-अलग प्रकार के किचन स्पंज को शामिल किया। इनमें पारंपरिक यूरोपीय स्पंज, उत्तरी अमेरिकी स्पंज और ऑर्गेनिक स्पंज शामिल थे। इन स्पंजों का कई सप्ताह तक सामान्य घरेलू उपयोग कराया गया, जिसके बाद उनकी संरचना और वजन में आए बदलावों का विश्लेषण किया गया।

अध्ययन के दौरान पाया गया कि इस्तेमाल के साथ सभी स्पंज धीरे-धीरे घिसते हैं और उनसे निकलने वाले सूक्ष्म कण पानी में मिल जाते हैं। यही कण आगे चलकर माइक्रोप्लास्टिक के रूप में पर्यावरण में फैलते हैं।

हर साल निकल रही माइक्रोप्लास्टिक की बड़ी मात्रा

रिपोर्ट के मुताबिक, स्पंज के प्रकार के आधार पर एक व्यक्ति के उपयोग से हर साल 0.68 ग्राम से लेकर 4.21 ग्राम तक माइक्रोप्लास्टिक निकल सकता है। यह मात्रा भले ही कम दिखाई दे, लेकिन यदि किसी देश की पूरी आबादी अधिक प्लास्टिक वाले स्पंज का इस्तेमाल करे तो सालाना करीब 355 टन माइक्रोप्लास्टिक पर्यावरण में पहुंच सकता है।

किस स्पंज से सबसे ज्यादा फैल रहा प्रदूषण?

शोध में पाया गया कि यूरोपीय स्पंज में प्लास्टिक की मात्रा सबसे अधिक थी। इसमें लगभग 59.3 प्रतिशत प्लास्टिक मौजूद था। वहीं उत्तरी अमेरिकी स्पंज में 41.9 प्रतिशत और ऑर्गेनिक स्पंज में केवल 15.9 प्रतिशत प्लास्टिक पाया गया।

इसी वजह से यूरोपीय स्पंज से सबसे अधिक माइक्रोप्लास्टिक निकलता देखा गया, जबकि ऑर्गेनिक स्पंज पर्यावरण के लिए अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प साबित हुआ।

सेहत पर पड़ सकता है गंभीर असर

वैज्ञानिक अभी माइक्रोप्लास्टिक के दीर्घकालिक प्रभावों का अध्ययन कर रहे हैं, लेकिन कई शोधों में संकेत मिले हैं कि ये सूक्ष्म कण शरीर की कोशिकाओं तक पहुंच सकते हैं और उनकी सामान्य कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क से कैंसर, हार्मोनल असंतुलन और प्रजनन क्षमता से जुड़ी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि बर्तन धोने की प्रक्रिया से होने वाले कुल पर्यावरणीय प्रभाव का 85 से 97 प्रतिशत हिस्सा पानी की खपत से जुड़ा हुआ है।

कौन से स्पंज हो सकते हैं बेहतर विकल्प?

विशेषज्ञों ने कम प्लास्टिक वाले या ऑर्गेनिक स्पंज के उपयोग की सलाह दी है। इसके साथ ही बर्तन धोते समय पानी की बचत पर भी जोर दिया गया है। पर्यावरण के लिहाज से सेल्यूलोज स्पंज, लूफा से बने स्पंज, नारियल के रेशों से तैयार स्पंज और पौधों से बने ऑर्गेनिक स्पंज बेहतर विकल्प माने जा रहे हैं।

 

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