
नई दिल्ली: Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग पर उठ रहे सवालों के बीच पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से पूरी स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करने की सलाह दी है। लवासा ने कहा कि केवल चुनाव आयुक्तों के साथ होने की तस्वीर सामने रखने से विवाद से जुड़े सवाल खत्म नहीं होंगे। उन्होंने SIR के तीसरे चरण को आगे बढ़ाने के बजाय पिछली मतदाता सूची के इस्तेमाल की भी वकालत की है।
आपत्तियों पर कार्रवाई को लेकर उठाए सवाल
अशोक लवासा का कहना है कि चुनाव आयोग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई आपत्तियों पर क्या कार्रवाई की गई और अंतिम फैसले किस प्रक्रिया के तहत लिए गए। उनका तर्क है कि अगर आयोग के भीतर अलग-अलग मत सामने आए थे, तो उन्हें महज सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा बताकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
लवासा के मुताबिक, SIR का तीसरा चरण अभी पूरा नहीं हुआ है। ऐसे में पहले से मौजूद मतदाता सूची का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, क्योंकि SIR से जुड़े कई सवालों पर अभी पर्याप्त स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
14 आपत्तियों की रिपोर्ट के बाद तेज हुआ विवाद
यह विवाद द इंडियन एक्सप्रेस की 25 सितंबर की रिपोर्ट के बाद और चर्चा में आया। रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्ति दर्ज कराई।
इनमें नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और बहाल करने, Form 6 में बदलाव तथा चुनावी डेटा के प्रबंधन से जुड़े मुद्दे शामिल बताए गए। रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने चुनावी डेटा के केंद्रीकरण और कुछ तकनीकी व्यवस्थाओं को लेकर भी सवाल उठाए थे।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इन आपत्तियों की प्रतियां CEC ज्ञानेश कुमार को भेजी गई थीं।
हालांकि, चुनाव आयोग ने रिपोर्ट में बताए गए मतभेदों को अलग-अलग अंतिम फैसलों के तौर पर स्वीकार नहीं किया है। आयोग का कहना है कि पिछले एक साल में लिए गए सभी फैसले, SIR समेत, तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी और सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग ने यह भी कहा कि कुछ चुनिंदा आंतरिक टिप्पणियों को व्यापक निर्णय प्रक्रिया से अलग करके देखने पर पूरी तस्वीर सामने नहीं आती।
‘सिर्फ साथ तस्वीर से सवाल खत्म नहीं होंगे’
SIR विवाद के बीच CEC ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों की संयुक्त तस्वीर भी सामने आई थी। इसके साथ आयोग ने मतदाता सूची और SIR से जुड़े कई फैसलों की जानकारी दी थी।
अशोक लवासा के मुताबिक, केवल यह दिखाना पर्याप्त नहीं है कि तीनों चुनाव आयुक्त साथ हैं। उनके अनुसार, मुख्य सवाल यह है कि आंतरिक स्तर पर दर्ज आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई, उनकी जांच किस तरह की गई और अंतिम निर्णय किस आधार पर लिए गए।
लवासा ने आयोग से पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक करने की बात कही है। उनका कहना है कि अगर किसी मामले में नियमों का उल्लंघन हुआ है तो उसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
SIR को लेकर क्यों बढ़ा विवाद?
SIR के दौरान मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने से जुड़े फैसले पहले से ही राजनीतिक बहस का विषय रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया कि दो चुनाव आयुक्तों ने इनसे संबंधित कई प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए थे।
वहीं, चुनाव आयोग का पक्ष अलग है। ECI का कहना है कि इस तरह की टिप्पणियां और सुझाव निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
ऐसे में विवाद का मुख्य मुद्दा यही है कि चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों पर किस तरह विचार किया गया और SIR की प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों पर आयोग की ओर से कितना विस्तृत स्पष्टीकरण सामने आता है।
Navyug Samachar