Thursday , 10 September 2026

SIR विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी! कहा- नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का काम नहीं, 25 अगस्त को फिर होगी सुनवाई

नेशनल डेस्क: पश्चिम बंगाल में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने शुक्रवार को सुनवाई के दौरान साफ कहा कि किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार नहीं है। चुनाव आयोग की भूमिका केवल मतदाता सूची के नियंत्रण, निगरानी और पुनरीक्षण तक सीमित है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं होने या हटाए जाने मात्र से उसकी नागरिकता खत्म नहीं हो जाती। नागरिकता से जुड़ा अंतिम फैसला चुनाव आयोग नहीं कर सकता।

नागरिकता पर फैसला लेने का अधिकार संबंधित प्राधिकरण के पास

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर किसी व्यक्ति की नागरिकता को लेकर कोई सवाल उठता है और सक्षम प्राधिकरण या ट्रिब्यूनल की कार्रवाई के बाद कोई मामला सामने आता है, तो चुनाव आयोग को उसे संबंधित मंत्रालय के पास भेजना होगा।

अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग केवल मतदाता सूची से जुड़े मामलों पर कार्रवाई कर सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति के नागरिक होने या न होने का अंतिम निर्णय नहीं ले सकता।

विधानसभा क्षेत्रवार जानकारी देने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़ी विधानसभा क्षेत्रवार जानकारी उपलब्ध कराने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान आई। अदालत ने याचिका पर सुनवाई जारी रखने पर सहमति जताई और मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त तय की है।

SIR को लेकर पश्चिम बंगाल में सियासी घमासान

पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर राजनीतिक विवाद भी तेज है। इस मामले में कई याचिकाएं पहले ही दाखिल की जा चुकी हैं। कुछ मामलों का निपटारा हो चुका है, जबकि कई मामलों पर सुनवाई जारी है।

सत्तारूढ़ दल का कहना है कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाना है। वहीं विपक्ष आरोप लगा रहा है कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए किया जा रहा है।

क्या है स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन?

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR चुनाव आयोग की ओर से चलाया जाने वाला विशेष अभियान है। इसका उद्देश्य मतदाता सूची को अपडेट करना, गलतियों को दूर करना और सूची को अधिक प्रमाणिक बनाना होता है।

आम तौर पर चुनाव आयोग हर साल मतदाता सूची का संक्षिप्त पुनरीक्षण करता है, लेकिन जब किसी राज्य या क्षेत्र में व्यापक स्तर पर जांच की जरूरत महसूस होती है, तब स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की प्रक्रिया शुरू की जाती है।

 

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