
नेशनल डेस्क: विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 को लेकर अमेरिका समेत कुछ देशों की ओर से उठाई गई आपत्तियों पर भारत ने स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि यह पूरी तरह भारत का आंतरिक मामला है और इस विषय पर कानून बनाने तथा निर्णय लेने का अधिकार केवल भारतीय संसद के पास है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि घरेलू कानूनों पर बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा।
विदेश मंत्रालय ने संसद के अधिकारों का किया उल्लेख
शुक्रवार को आयोजित मीडिया ब्रीफिंग के दौरान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इस मुद्दे पर पूछे गए सवाल का जवाब देते हुए कहा कि भारत में कानून बनाने की एक स्थापित लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि घरेलू कानूनों को उनके सही संदर्भ में देखा जाना चाहिए और इस संबंध में निर्णय लेने का अधिकार संसद को प्राप्त है।
अमेरिकी सांसद की टिप्पणी के बाद आया भारत का जवाब
विदेश मंत्रालय की यह प्रतिक्रिया अमेरिका के वेस्ट वर्जीनिया से रिपब्लिकन सांसद मूर की हालिया टिप्पणी के बाद सामने आई है। मूर ने दावा किया था कि प्रस्तावित एफसीआरए संशोधन का असर ईसाई समुदाय और धार्मिक संस्थाओं पर पड़ सकता है। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि यह कानून लागू होता है तो इसका प्रभाव भारत-अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों पर भी पड़ सकता है।
‘विदेशी फंडिंग पर नियंत्रण केवल भारत ही नहीं करता’
रणधीर जायसवाल ने कहा कि दुनिया के कई देशों में विदेशी योगदान को लेकर कानूनी व्यवस्थाएं लागू हैं और अमेरिका भी अपने कानूनों के तहत विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करता है। ऐसे में भारत भी अपने कानूनी ढांचे के अनुसार विदेशी अंशदान के नियमन के लिए आवश्यक प्रावधान लागू कर सकता है।
मूर ने क्या जताई थी आशंका
4 अगस्त को जारी अपने बयान में अमेरिकी सांसद मूर ने कहा था कि प्रस्तावित संशोधनों के बाद यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण रद्द हो जाता है या उसका नवीनीकरण नहीं होता है, तो सरकार उसकी विदेशी संपत्तियों और संबंधित परिसंपत्तियों के प्रबंधन का अधिकार अपने हाथ में ले सकती है। उनका दावा था कि ऐसे प्रावधानों का सबसे अधिक असर ईसाई चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं पर पड़ सकता है। उन्होंने भारतीय सरकार से इस प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने की अपील भी की थी।
क्या है एफसीआरए संशोधन विधेयक 2026 का उद्देश्य
प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 का उद्देश्य विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम 2010 में बदलाव करना है। यह कानून भारत में व्यक्तियों, संस्थाओं और गैर-सरकारी संगठनों को मिलने वाले विदेशी योगदान और उसके उपयोग को नियंत्रित करता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी फंडिंग का देश की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा, जनहित और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
संशोधन में क्या प्रस्तावित है
प्रस्तावित संशोधनों के अनुसार यदि किसी संगठन का एफसीआरए पंजीकरण रद्द हो जाता है, वह सरेंडर कर दिया जाता है या उसका नवीनीकरण नहीं होता, तो सरकार की ओर से नियुक्त प्राधिकरण को उस संस्था के विदेशी योगदान और उससे संबंधित संपत्तियों का अस्थायी प्रबंधन करने का अधिकार होगा। वहीं, यदि मामला किसी धार्मिक संस्था या पूजा स्थल से जुड़ा होगा तो नियुक्त प्राधिकरण को उसकी धार्मिक प्रकृति और स्वरूप को यथावत बनाए रखना होगा।
सरकार ने बताया संशोधन का मकसद
केंद्र सरकार का कहना है कि प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाली संस्थाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही और बेहतर प्रशासन सुनिश्चित करना है। सरकार के अनुसार जिन मामलों में कोई संगठन विदेशी चंदा प्राप्त करने की पात्रता खो देता है, वहां विदेशी अंशदान और उससे जुड़ी संपत्तियों के प्रबंधन के लिए स्पष्ट कानूनी व्यवस्था उपलब्ध कराना इस संशोधन का प्रमुख उद्देश्य है।
Navyug Samachar