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भगत सिंह ने जेल में क्यों लिखा था ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’? 1930 के उस लेख में उठाए थे आस्था, तर्क और इंसानी पीड़ा से जुड़े सवाल

नेशनल डेस्क: भगत सिंह को अक्सर एक महान क्रांतिकारी के तौर पर याद किया जाता है, लेकिन वे गहरे पाठक, पत्रकार और विचारक भी थे। लाहौर सेंट्रल जेल में रहने के दौरान उन्होंने काफी पढ़ा और लिखा। इसी दौर में उन्होंने ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ लेख लिखा, जो आज भी उनके विचारों और तर्कपूर्ण दृष्टिकोण के कारण चर्चा में रहता है।

बाबा रणधीर सिंह से मुलाकात के बाद लिखा लेख

4 अक्टूबर 1930 को गदर पार्टी से जुड़े धार्मिक विचारों वाले बाबा रणधीर सिंह लाहौर जेल में भगत सिंह से मिलने पहुंचे थे। बताया जाता है कि उन्होंने भगत सिंह को ईश्वर में आस्था रखने के लिए समझाने की कोशिश की। उन्होंने यह भी कहा कि शोहरत के घमंड के कारण भगत सिंह भगवान से दूर हो गए हैं।

इसी बात के जवाब में भगत सिंह ने 5 और 6 अक्टूबर 1930 को ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ लेख लिखा। लेख के जरिए उन्होंने उस धारणा का तर्क के आधार पर जवाब देने की कोशिश की कि ईश्वर में विश्वास न करना उनके अहंकार का परिणाम है।

भगत सिंह ने नास्तिकता को तर्क से जोड़ा

अपने लेख में भगत सिंह ने स्पष्ट किया कि उनकी नास्तिकता अहंकार की वजह से नहीं, बल्कि सोच-विचार और तर्क से बनी मान्यता है। उनके मुताबिक अपनी विचारधारा पर कायम रहने को केवल घमंड मान लेना उचित नहीं है।

उनका लेख धार्मिक आस्था और तर्क के बीच उनके अपने विचारों को सामने रखता है। यही वजह है कि इसे उनके वैचारिक विकास को समझने वाले महत्वपूर्ण लेखों में गिना जाता है।

गरीबी और अन्याय को लेकर उठाए सवाल

भगत सिंह ने अपने लेख में दुनिया में मौजूद गरीबी, शोषण और अन्याय का भी जिक्र किया। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कोई सर्वशक्तिमान सत्ता मौजूद है, तो दुनिया में इतना कष्ट और अन्याय क्यों है।

इन सवालों के जरिए उन्होंने ईश्वर और मानव जीवन में मौजूद दुख के संबंध को लेकर अपने तर्क सामने रखे। उनके विचारों में सवाल पूछने और किसी मान्यता को तर्क की कसौटी पर परखने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।

मार्क्स, लेनिन और बाकुनिन को पढ़ते थे

भगत सिंह केवल क्रांतिकारी गतिविधियों तक सीमित नहीं थे। वे अलग-अलग विचारकों और राजनीतिक सिद्धांतों का अध्ययन भी करते थे। उन्होंने मार्क्स, लेनिन और बाकुनिन जैसे विचारकों को पढ़ा।

इस अध्ययन ने उनके विचारों को दिशा दी और उनकी सोच में वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा तर्कशीलता को जगह मिली। जेल में बिताए समय के दौरान पढ़ने-लिखने के प्रति उनका जुड़ाव लगातार बना रहा।

आस्था और मुश्किल हालात को लेकर क्या था नजरिया?

भगत सिंह ने माना कि कठिन परिस्थितियों में आस्था इंसान को मानसिक सहारा दे सकती है। हालांकि, उनका विचार था कि मुश्किल समय में व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़े होकर परिस्थितियों का साहस के साथ सामना करना चाहिए।

उनके लेख में इसी सोच के जरिए यह बात सामने आती है कि कठिनाइयों से निपटने के लिए इंसान को अपने विवेक और साहस का इस्तेमाल करना चाहिए।

फांसी की सजा के बाद भी जारी रही लेख की चर्चा

7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई। इसके बाद 23 मार्च 1931 को राजगुरु और सुखदेव के साथ उन्हें फांसी दे दी गई।

उनकी मृत्यु के बाद 27 सितंबर 1931 को ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ लेख लाला लाजपत राय के अंग्रेजी साप्ताहिक ‘द पीपल’ में प्रकाशित हुआ। भगत सिंह के निधन के बाद प्रकाशित इस लेख ने उनके क्रांतिकारी व्यक्तित्व के साथ-साथ उनके वैचारिक और बौद्धिक पक्ष को भी व्यापक रूप से सामने रखा।

 

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