
धर्म डेस्क: ओडिशा के पुरी में होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और गूढ़ मान्यताओं का अद्भुत संगम है। हर साल लाखों श्रद्धालु इस भव्य यात्रा के साक्षी बनने के लिए पुरी पहुंचते हैं, जहां भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा रथों पर सवार होकर भक्तों के बीच आते हैं।
इसी रथ यात्रा के दौरान एक विशेष अनुष्ठान ‘अधर पाना’ किया जाता है, जिसे लेकर कई लोग हैरान रह जाते हैं, क्योंकि इस भोग को भक्तों में वितरित करने के बजाय सीधे जमीन पर बहा दिया जाता है।
क्या है अधर पाना अनुष्ठान?
पुरी जगन्नाथ मंदिर में रथ उत्सव के दौरान किया जाने वाला ‘अधर पाना’ एक विशेष धार्मिक परंपरा है। यह अनुष्ठान आषाढ़ माह की त्रयोदशी तिथि के आसपास किया जाता है। इसमें मिट्टी के बड़े बर्तनों में लगभग 100 लीटर का मीठा पेय तैयार किया जाता है और भगवान को अर्पित किया जाता है।
दूध और मसालों से बनता है खास पेय
अधर पाना नामक यह पेय दूध, तुलसी, केला, कपूर, काली मिर्च और दालचीनी जैसी सामग्रियों से तैयार किया जाता है। यह दिखने में खीर जैसा प्रतीत होता है, लेकिन इसकी धार्मिक मान्यता इसे और भी विशेष बनाती है।
सबसे चौंकाने वाली परंपरा यह है कि इस पेय को न तो भक्तों में बांटा जाता है और न ही सेवन किया जाता है, बल्कि इसे भगवान के होंठों से स्पर्श कराकर सीधे जमीन पर बहा दिया जाता है।
आखिर जमीन पर क्यों बहाया जाता है भोग?
परंपरा के अनुसार, यह भोग केवल भगवान जगन्नाथ को समर्पित नहीं होता, बल्कि इसे अदृश्य शक्तियों के लिए भी अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि रथ यात्रा के दौरान भगवान के साथ दिव्य शक्तियों के अलावा कुछ अदृश्य नकारात्मक शक्तियां भी यात्रा में शामिल रहती हैं।
इन्हीं शक्तियों को शांत करने और रथों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से ‘अधर पाना’ को जमीन पर बहाया जाता है। यही कारण है कि इसे भक्तों के सेवन के लिए नहीं रखा जाता।
तीन दिनों तक चलता है विशेष अनुष्ठान
यह परंपरा रथ यात्रा के दौरान तीन दिनों तक निभाई जाती है। इस दौरान भोग को विशेष मिट्टी के बर्तनों में तैयार किया जाता है और स्थानीय परंपरागत पुजारियों द्वारा विधि-विधान से अर्पित किया जाता है। इस कार्य को ‘महासूरा’ कहे जाने वाले विशेष लोग संपन्न करते हैं।
भक्तों के लिए विशेष संदेश
श्रद्धालुओं को यह भी निर्देश दिया जाता है कि इस भोग को न तो छुएं और न ही ग्रहण करें, क्योंकि यह केवल दिव्य और अदृश्य शक्तियों के लिए समर्पित माना जाता है। इसका उद्देश्य केवल आध्यात्मिक संतुलन और परंपरा का पालन करना है।
Navyug Samachar