नेशनल डेस्क : फिक्स्ड डिपॉजिट को आमतौर पर सुरक्षित निवेश का सबसे भरोसेमंद माध्यम माना जाता है, लेकिन अगर मैच्योरिटी के बाद बैंक ही ग्राहक की जमा राशि लौटाने से इनकार कर दे तो स्थिति कितनी मुश्किल हो सकती है, इसका उदाहरण केरल से सामने आया है। एक व्यक्ति को अपनी ही जमा पूंजी वापस पाने के लिए करीब 11 वर्षों तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। आखिरकार अदालत ने बैंक को फटकार लगाते हुए मूल राशि के साथ 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज और 10 हजार रुपये मुआवजा देने का आदेश सुनाया।
मैच्योरिटी पूरी होने के बाद भी नहीं मिला भुगतान
मामला केरल के त्रिशूर निवासी सेतुमाधवन से जुड़ा है। उन्होंने बैंक में 5 लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट कराई थी, जिसकी मैच्योरिटी 2 जून 2015 को पूरी हो गई थी। निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद जब उन्होंने अपनी जमा राशि वापस मांगी तो बैंक ने तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए भुगतान करने से इनकार कर दिया। कई बार प्रयास करने के बावजूद रकम नहीं मिलने पर उन्होंने जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का रुख किया।
उपभोक्ता आयोग ने बैंक को सुनाया था सख्त आदेश
मामले की सुनवाई के बाद जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने 31 दिसंबर 2021 को बैंक को निर्देश दिया कि वह ग्राहक को 5 लाख रुपये की मूल राशि के साथ 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज, 10 हजार रुपये मुआवजा और मुकदमे का खर्च भी अदा करे। हालांकि बैंक ने आदेश का पालन करने के बजाय उसे अदालत में चुनौती देने का फैसला किया।
825 दिन की देरी से पहुंचा हाईकोर्ट, दलील नहीं आई काम
बैंक ने केरल हाईकोर्ट में अपील दाखिल की, लेकिन यह अपील 825 दिनों की देरी से की गई थी। बैंक का कहना था कि उस समय उसका प्रबंधन प्रशासक के अधीन था, इसलिए समय पर अपील दाखिल नहीं की जा सकी। हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और उपभोक्ता आयोग के फैसले को सही ठहराते हुए बैंक की अपील खारिज कर दी।
बड़ी बेंच में भी नहीं मिली राहत
एकल पीठ से झटका मिलने के बाद बैंक ने मामला हाईकोर्ट की बड़ी बेंच के समक्ष रखा। इस बार बैंक ने दलील दी कि वह एक सहकारी बैंक है और विवाद की सुनवाई उपभोक्ता आयोग के बजाय सहकारी समिति कानून के तहत होनी चाहिए। हालांकि 2 जून 2026 को बड़ी बेंच ने भी बैंक की सभी दलीलों को खारिज कर दिया।
उपभोक्ता आयोग के अधिकार क्षेत्र पर कोर्ट की स्पष्ट टिप्पणी
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि उपभोक्ता संरक्षण कानून नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए बनाया गया विशेष कानून है और इसकी व्यवस्था अन्य कानूनों के अतिरिक्त लागू होती है। ऐसे में कोई भी बैंक या संस्था उपभोक्ता आयोग के अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं हो सकती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ग्राहकों की जमा राशि समय पर लौटाना बैंक की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
तकनीकी बहानों से ग्राहक को परेशान करना निंदनीय
हाईकोर्ट ने बैंक के रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब बैंक स्वयं यह नहीं नकार रहा कि जमा राशि लौटानी है, तब केवल तकनीकी आधारों पर ग्राहक को वर्षों तक परेशान करना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि बैंकिंग संस्थानों की जिम्मेदारी जनता का विश्वास बनाए रखना है, न कि ग्राहकों को न्याय के लिए लंबे समय तक भटकाना।
भुगतान के लिए मिला छह महीने का अंतिम समय
सुनवाई के दौरान बैंक ने अदालत से भुगतान के लिए छह महीने का समय मांगा। अदालत ने यह अनुरोध स्वीकार करते हुए बैंक को निर्देश दिया कि वह छह महीने के भीतर पूरी जमा राशि, 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज और 10 हजार रुपये मुआवजा अदा करे।
FD निवेशकों के अधिकारों को मिला मजबूत सहारा
यह फैसला उन सभी निवेशकों के लिए अहम माना जा रहा है जिनकी जमा राशि का भुगतान किसी कारणवश अटक जाता है। अदालत ने साफ संकेत दिया है कि यदि कोई बैंक या वित्तीय संस्था मैच्योरिटी के बाद भी ग्राहक की रकम लौटाने में लापरवाही करती है तो उसके खिलाफ उपभोक्ता मंच और अदालत में प्रभावी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
Navyug Samachar