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भारत की पहली स्वदेशी MRI मशीन की कहानी, रतन टाटा और श्रीधर वेम्बू के सहयोग से ऐसे बदली तस्वीर

टेक डेस्क: भारत में अब स्वदेशी मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग यानी MRI मशीन तैयार हो चुकी है। बेंगलुरु की कंपनी VoxelGrids ने अपनी नई तकनीक के जरिए कम लागत वाली MRI मशीन विकसित की है, जो देश में चिकित्सा सुविधाओं को ज्यादा सुलभ बनाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। इस तकनीक को तैयार करने के सफर में टाटा ट्रस्ट और Zoho के संस्थापक श्रीधर वेम्बू के सहयोग की अहम भूमिका रही है।

विदेशी कंपनियों के दबदबे के बीच शुरू हुई स्वदेशी MRI की कोशिश

कई दशकों से अमेरिका, जर्मनी, जापान, चीन, इटली और नीदरलैंड जैसी कंपनियां MRI मशीनों का निर्माण करती रही हैं। दुनिया भर के अस्पताल इन मशीनों का इस्तेमाल करते हैं और भारत भी इनके बड़े बाजारों में शामिल रहा है।

बेंगलुरु स्थित VoxelGrids के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी अर्जुन अरुणाचलम ने जब भारत में MRI मशीन बनाने की शुरुआत की, तो उन्हें कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उनका कहना था कि नई तकनीक पर काम करने वाली छोटी कंपनियों को अक्सर बड़ी विदेशी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है।

रतन टाटा और श्रीधर वेम्बू के सहयोग से मिली मजबूती

अर्जुन अरुणाचलम के स्टार्टअप को शुरुआती दौर में टाटा ट्रस्ट से समर्थन मिला। साल 2015 में टाटा ट्रस्ट के तत्कालीन अध्यक्ष रतन टाटा से मुलाकात के बाद कंपनी को पहली बड़ी आर्थिक मदद मिली।

इसके बाद साल 2021 में Zoho के संस्थापक श्रीधर वेम्बू की ओर से भी कंपनी को सहयोग मिला। इस आर्थिक सहायता से VoxelGrids को अपनी तकनीक विकसित करने और स्वदेशी MRI स्कैनर तैयार करने के लिए जरूरी समय और संसाधन मिल सके।

MRI स्कैन की लागत में 70 फीसदी तक कमी का दावा

कंपनी के संस्थापक अर्जुन अरुणाचलम के अनुसार, VoxelGrids की MRI मशीन से स्कैन की लागत में लगभग 70 फीसदी तक कमी आ सकती है। कंपनी का दावा है कि उसकी मशीनें मौजूदा MRI मशीनों की तुलना में 40 फीसदी तक सस्ती और 50 फीसदी तक हल्की होंगी।

इससे मशीन की स्थापना लागत भी कम हो सकती है और देश के दूरदराज इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं को पहुंचाने में मदद मिल सकती है। भारत में हर साल MRI से जुड़े हजारों करोड़ रुपये के उत्पादों का आयात किया जाता है, ऐसे में स्वदेशी तकनीक को अहम कदम माना जा रहा है।

अरुणाचलम ने क्यों चुनी MRI बनाने की चुनौती

अर्जुन अरुणाचलम का मानना था कि MRI मशीन बनाना जेट इंजन या रॉकेट जैसी जटिल तकनीक विकसित करने के बराबर है। इसमें भौतिकी, इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर और सटीक इंजीनियरिंग की गहरी समझ की जरूरत होती है।

अरुणाचलम ने अमेरिका के विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय से MRI फिजिक्स में पढ़ाई की और इसके बाद जीई हेल्थकेयर के रिसर्च सेंटर में काम किया। इसी दौरान उन्हें MRI तकनीक की गहरी समझ मिली।

बाद में वह सिंगापुर गए और आईआईटी बॉम्बे में भी पढ़ाया। हालांकि, उनका लक्ष्य भारत में रहकर चिकित्सा क्षेत्र में कुछ बड़ा बदलाव लाना था।

चार इंजीनियरों से शुरू हुई टीम अब 33 सदस्यों तक पहुंची

VoxelGrids ने शुरुआत में MRI इमेजिंग सॉफ्टवेयर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक पर काम करने की योजना बनाई थी। लेकिन जब मौजूदा MRI निर्माता कंपनियों ने अपने सिस्टम में बाहरी तकनीक को शामिल करने की अनुमति नहीं दी, तो कंपनी ने खुद की MRI मशीन बनाने का फैसला किया।

कंपनी ने MRI मशीन के सॉफ्टवेयर से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स तक कई हिस्सों को खुद डिजाइन किया। शुरुआत में चार इंजीनियरों की टीम अब बढ़कर 33 सदस्यों तक पहुंच चुकी है।

अर्जुन अरुणाचलम के मुताबिक, कंपनी की MRI मशीन की इमेज क्वालिटी अन्य MRI मशीनों के बराबर है और इसका डिजाइन अलग तकनीक पर आधारित है।

 

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